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कैराना उपचुनाव: कम मतदान से किसे फायदा, किसे नुकसान, जानिए खास बातें

Wed, 30 May 2018 10:14 AM IST
यूपी अमर उजाला ब्यूरो, आनंद प्रकाश, शामली
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वोट डालने के लिए लाइन में लगे मतदाता - फोटो : अमर उजाला
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शामली में कैराना लोकसभा सीट के उपचुनाव में मतदान का प्रतिशत 2014 के लोकसभा चुनाव की अपेक्षा करीब 20 प्रतिशत और एक साल पूर्व हुए 2017 के विधानसभा चुनाव की अपेक्षा करीब 15 प्रतिशत कम मतदान हुआ है। इससे किसे नुकसान होगा और कौन फायदे में रहेगा, इसका आंकलन करना मुश्किल हो रहा है। यही वजह है कि दोनों ही खेमों से जुड़े लोगों की सांसें अटकी हुई हैं। अब 31 मई को मतगणना होने पर ही पता चल पाएगा कि मतदान प्रतिशत में हुई गिरावट का क्या असर रहा। 

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दरअसल, एक साल पूर्व ही जब 2017 का विधानसभा चुनाव हुआ, तो उसमें शामली जनपद की तीनों ही सीटों पर 60 प्रतिशत से ज्यादा मतदान हुआ था। उनमें कैराना विधानसभा क्षेत्र में 69.53, थानाभवन में 68.31 और शामली विधानसभा क्षेत्र में 65.42 प्रतिशत मतदान हुआ था। 2012 के विधानसभा चुनाव में भी कैराना सीट पर 66, थानाभवन क्षेत्र में 61.41 और शामली क्षेत्र में 60.91 प्रतिशत मतदान हुआ था। इन दोनों ही विधानसभा चुनावों के मतदान प्रतिशत से तुलना की जाए तो कैराना उपचुनाव में तीनों सीटों पर उपचुनाव में मतदान प्रतिशत कम रहा है। कैराना सीट पर 59.56, थानाभवन सीट पर 53.06 और शामली सीट पर 50.66 प्रतिशत मतदान हुआ है। एक साल के भीतर ही जिले की तीनों सीटों पर 15-15 प्रतिशत कम मतदान हुआ है। वहीं, 2014 के लोकसभा चुनाव की अपेक्षा शामली जिले की तीनों विधानसभा क्षेत्रों का कुल मतदान प्रतिशत करीब 20 प्रतिशत कम रहा है। 2014 में 73.08 प्रतिशत मतदान हुआ था, जबकि अब उपचुनाव में करीब 55 प्रतिशत मतदान हो पाया है।

पढ़ें : कैराना उपचुनाव 2018: EVM में गड़बड़ी के बाद 73 बूथों पर दोबारा होगी वोटिंग

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वोट डालने के लिए लाइन में लगे मतदाता - फोटो : अमर उजाला
ऐसे में हर राजनीतिक दल के लोग अपने हिसाब से आंकड़े लगा रहे हैं। कोई मान रहा है कि कम मतदान प्रतिशत गठबंधन के लिए खतरे की घंटी हो सकती है तो कोई मानता है कि कम मतदान प्रतिशत में भाजपा को नुकसान पहुंचा सकता है। चुनाव नतीजों से ही यह होगा कि कम मतदान का किसे फायदा हुआ और किसे नुकसान। 

गठबंधन के साथ जाते दिखे दलित
कैराना लोस सीट के उपचुनाव में हुए मतदान में दलित समाज गठबंधन के साथ जाता दिखाई दिया। यह बात अलग है कि उपचुनाव के प्रचार के दौरान एक भी बसपा नेता ने गठबंधन प्रत्याशी के चुनावी मंच को साझा नहीं किया और बसपा अध्यक्ष की तरफ से भी उपचुनाव के लिए रुख स्पष्ट नहीं किया गया था। इसके बावजूद खामोशी के साथ दलित समाज में भाजपा का विरोध बना रहा। खासकर ग्रामीण क्षेत्र में ज्यादा प्रभाव दिखाई दिया। दलित समाज के लोगों का कहना था कि पूर्व में सहारनपुर के शब्बीरपुर कांड और दो अप्रैल को हुई घटनाओं की वजह से दलित समाज में भाजपा के प्रति नाराजगी है।

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