परिवर्तन के लिए लिखा
कवि डॉ. सुमनेश सुमन कहते हैं कि स्व. डॉ. शैल रस्तोगी की कविताएं, एकांकी या कहानियां जो भी हो समाज में परिवर्तन की मांग करते थे। लेखन का केंद्र नारी सम्मान और उनका उत्थान करना था। वह सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार करने वाली थीं।
डॉ. शैल रस्तोगी का परिचय
एक सितंबर 1927 को जन्मीं डॉ. शैल रस्तोगी ने आगरा विवि से एमए के बाद बीएचयू से पीएचडी की। डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी के निर्देशन में पीएचडी की। आरजी पीजी कॉलेज में हिंदी विभाग में 34 वर्ष अध्यापन किया। 21 शोधार्थी को पीएचडी कराई। इनके स्वयं के जीवन पर पीएचडी हो चुकी है। पराग, जंग लगे दर्पण, प्रतिबिंब तुम, मन हुए कांच के, धूप लिखे आखर प्रमुख काव्य संग्रह हैं। एकांकी में एक जिंदगी बंजारा को उप्र राज्य पुरस्कार से नवाजा गया। बिना रंगों के इंद्रधनुष, सावधान, सासू जी आलोचना है। भूषण व उनका काव्य, प्रेमचंद और उनका गोदान भी इनकी चर्चित कृतियां हैं। निबंध, लेख, कहानी, काव्य संग्रह, लघुकथाएं, नाटक व एकांकी पर 100 से अधिक पुस्तकें व रचनाएं प्रकाशित हुईं। हिंदुस्तान में वह हाइकु की जनक मानी जाती हैं।
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