पहली कहानी यह है कि इसको लोग गुजरी बाजार कहते थे। दरअसल, यहां नालों पर बने चबूतरों पर गुर्जर समुदाय की महिलाएं देसी घी बेचने के लिए मटके लाती थीं। इसलिए लोग आम बोलचाल में इसे गुजरी बाजार कहते थे।
उन्होंने बताया कि दूसरी कहानी यह है कि यहां रजाइयों में भरी जाने वाली रूई की गुदड़ी का काम होता था। गुदड़ी बिकती थी। इस वजह से कुछ लोग इसे गुदड़ी बाजार कहते थे। दोनों नाम मिलते-जुलते थे, लिहाजा बाद में गुदड़ी प्रचलन में ज्यादा रहा। हालांकि अब तिहरे हत्याकांड की वजह से इसे ज्यादा जोड़कर देखा जाता है।