मेरठ। परतापुर गगोल पराग दुग्ध प्लांट कर्ज में डूबा है। किसान और कर्मचारियों का तीन माह का बकाया है। प्लांट को उबरने के लिए कम से कम 40 करोड़ रुपये की जरूरत है। धन के अभाव में किसानों को दूध का भुगतान नहीं बल्कि आश्वासन थमाया जा रहा है। अगर सरकार ने सहायता राशि नहीं दी तो प्लांट संचालन में संकट खड़ा हो सकता है। गगोल दुग्ध प्लांट प्रशासन का कहना है कि सरकार से बजट मांगा गया है।
गगोल में चार लाख लीटर दूध की क्षमता का पराग दुग्ध प्लांट है। पराग दुग्ध संघ के अधिकारियों की मानें तो पूरे जिले से किसानों का दूध प्लांट में पहुंचता है। दूध से घी, पनीर, दही, मिल्ककेक, पेड़ा, आदि प्रोडेक्ट तैयार किए जाते हैं। शहर में ही नहीं बल्कि देहात में भी पराग दूध की सप्लाई करता है। प्रतिदिन 50 हजार ली. दूध की पैकिंग की जाती है। प्लांट संचालन पर निगरानी के लिए दुग्ध समितियों के प्रतिनिधियों में से ही सभापति और डायरेक्टर चुने जाते हैं। ताकि किसान पशुपालकों को उनके दूध का उचित रेट और समय पर भुगतान हो सके।
प्लांट में अधिक खर्च ने बिगाड़ा बजट
- गगोल पराग दुग्ध संघ के अधिकारियों की मानें तो दुग्ध प्लांट में आय के मुताबिक खर्च अधिक हो रहा है। प्लांट की क्षमता बढ़ाने या फिर प्रोडेक्ट बिक्री पर कम काम हो रहा है जबकि कर्मचारियों की भर्ती लगातार चल रही है। सबसे अधिक खर्च ट्रांसपोर्ट और कर्मचारियों पर है।
- मैंने गगोल दुग्ध प्लांट में एक मार्च से ही चार्ज संभाला है। यह बात सही है कि अभी भी किसानों का लगभग 16 करोड़ बकाया है। कर्मचारियों का भी पिछला वेतन बकाया चल रहा है। हमने अपने कार्यकाल का लगभग 15 करोड़ का भुगतान दो माह में किया है। सरकार से 40 करोड़ रुपये का बजट मांगा है। बजट मिलते ही किसान और कर्मचारियों के बकाए का भुगतान किया जाएगा। हमसे पहले ही कंपनी पर अधिक खर्च का दबाव चल रहा है। हमने अपने कार्यकाल में तीन हजार लीटर दूध की बिक्री बढ़ाई है। - अविनाश सत्यार्थी, महाप्रबंधक, पराग दुग्ध प्लांट गगोल।
- 2012 से 2017 तक पराग दुग्ध संघ गगोल के हम सभापति रहे। हमारे समय में पराग दुग्ध संघ आठ करोड़ के मुनाफे में था। किसान और दुग्ध उत्पादकों व कर्मचारियों को समय पर पैमेंट होता था। एडवांस भी दिया जाता था। उस समय करीब दस हजार किसान जुड़े थे। अब गगोल पराग प्लांट लगभग 50 करोड़ के घाटे में है। 20 करोड़ की लिमिट खत्म कर ली, स्क्रेप बेच लिया। और सरकार से मिले करोड़ों रुपये के भी बंदरबांट हो गई। किसान और दुग्ध उत्पादक परेशान है। - इंद्रेश गुर्जर, पूर्व सभापति पराग दुग्ध संघ गगोल।