किसान आंदोलन के छह माह पूरे किसान दिखा रहे काले झंडे
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कृषि कानूनों के विरोध में पिछले साल 26 दिसंबर को शुरू हुआ किसान आंदोलन जारी है। भाकियू प्रवक्ता चौधरी राकेश टिकैत के आंसुओं का असर यह रहा कि आंदोलन न केवल खत्म होने से बच गया, बल्कि मजबूत भी हुआ। अगर भाकियू की बात करें तो यह अब तक का सबसे लंबे समय तक चलने वाला आंदोलन है।
बुधवार को आंदोलन को छह माह गुजर गए। अब भी किसानों में आंदोलन की शुरुआत जैसा ही जोश दिख रहा है। किसानों ने हक लिए बगैर वापस नहीं लौटने का संकल्प लिया है। गन्ना और गेहूं कटाई के बाद खाली हुए किसानों ने फिर से दिल्ली की तरफ कूच करना शुरू कर दिया है। बुधवार को संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर देहात क्षेत्र में किसानों ने पूरे जोश के साथ काला दिवस मनाया। अपने घरों व ट्रैक्टरों पर काले झंडे लगाकर सरकार का विरोध किया। इस दौरान केंद्र सरकार के पुतले भी दहन किए गए और काला दिवस की तमाम गतिविधियों को सोशल मीडिया पर वायरल किया गया।
टूटा रजबपुर आंदोलन का रिकॉर्ड
छह मार्च 1988 को रजबपुर में पुलिस की गोली से मारे गए पांच किसानों के बाद किसान मसीहा चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में किसानों ने जेल भरों आंदोलन शुरू किया था, यह आंदोलन 110 दिन तक चला था। वहीं मेरठ कमिश्नरी पर 27 जनवरी 1988 को शुरू हुआ आंदोलन 24 दिन तक चला था। इसके अलावा मुजफ्फरनगर के भोपा में नईमा हत्याकांड के विरोध में दो अगस्त को शुरू हुआ भाकियू का आंदोलन 42 दिन तक चला था।
चौधरी अजित सिंह के समर्थन से मिली धार
26 जनवरी को ट्रैक्टर परेड के दौरान दिल्ली लाल किला पर हुई हिंसा के बाद किसान आंदोलन कमजोर हुआ था। किसान अपने ट्रैक्टरों के साथ घर लौटने लगे थे। गाजीपुर बॉर्डर पर भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत को गिरफ्तार करने के लिए भारी पुलिस बल पहुंच गया था। मीडिया से बात करते हुए टिकैत की आंखों से आंसू छलक आए। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हुई तो किसानों के बीच आक्रोश फैल गया। इसी दौरान तत्कालीन रालोद अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह ने टिकैत को कॉल कर समर्थन दिया था, जिसके कुछ घंटे बाद ही गाजीपुर बॉर्डर पर फिर से किसानों का जमावड़ा लगना शुरू हुआ जो अब इतिहास बन चुका है।