- दुर्वासा ऋषि की तपोस्थली है फिरोजपुर, कुंती और गांधारी ने भी की थी पूजा
- सावन-फाल्गुन में यहां उमड़ता है कांवड़ियों का सैलाब
कुंवर राजकुमार चौहान
बहसूमा (मेरठ)। गंगापुत्र भीष्म की प्राचीन नगरी बहसूमा और हस्तिनापुर के ऐतिहासिक आंचल में बसा फिरोजपुर सिद्ध पीठ महादेव मंदिर क्षेत्र ही नहीं, बल्कि देश-प्रदेश के श्रद्धालुओं के लिए अगाध आस्था और अलौकिक रहस्यों का केंद्र है। कस्बे से लगभग छह किलोमीटर दूर स्थित यह प्राचीन शिवधाम अपने आप में सदियों पुराना इतिहास और अटूट पौराणिक मान्यताएं समेटे हुए है।
महर्षि दुर्वासा की तपोभूमि और महाभारत काल के साक्षी पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस पवित्र स्थान की स्थापना स्वयं क्राेध व तप के प्रतीक महर्षि दुर्वासा ने की थी। उन्होंने इसी स्थान पर कठिन तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया था। जनश्रुतियों के अनुसार, महाभारत युद्ध के दौरान जब कुरुक्षेत्र की भूमि में भयंकर धर्मयुद्ध छिड़ा था, तब पांडवों की माता कुंती और कौरवों की माता गांधारी अपने-अपने पुत्रों की विजय और सुरक्षा की कामना लेकर इस सिद्ध पीठ में भगवान आशुतोष का आशीर्वाद लेने पहुंची थीं। मान्यता है कि यहां मांगी गई हर मन्नत पूर्ण होती है। आज तक कोई भी श्रद्धालु इस दर से खाली हाथ नहीं लौटा है।
झाड़ियों में विलुप्त शिवलिंग और बछिया का दुग्धाभिषेक
मंदिर से जुड़ी एक अत्यंत प्रामाणिक और रोचक किवदंती मुगल काल से जुड़ी है। बताया जाता है कि उस दौर में यह पवित्र शिवलिंग घने जंगलों और झाड़ियों के बीच विलुप्त हो गया था। फिरोजपुर गांव के तत्कालीन जमींदार सैयद हैदर अली को इसका पता चलने पर उन्होंने एक अद्भुत दृश्य देखा। उनकी एक बछिया प्रतिदिन चरते-चरते झाड़ियों के बीच जाती और स्वयं ही अपने थनों से शिवलिंग पर दूध की धारा अर्पित करने लगती। सच्चाई जानने के लिए जब जमींदार ने उस स्थान की खुदाई करवाई तो एक दिव्य चमत्कार हुआ। मजदूर जितनी गहराई तक खुदाई करते शिवलिंग उतना ही नीचे धंसता चला जाता। इसे हथौड़े और आरी से काटने का भी प्रयास किया गया तब भी असफलता ही हाथ लगी। आज भी शिवलिंग पर उस प्रयास के निशान मौजूद बताए जाते हैं। जो इसके असीम और अनंत होने का प्रमाण हैं।
स्वप्न में निर्देश और जलाभिषेक की परंपरा
मंदिर के पुजारी संजय कुमार बताते हैं कि वर्षों पूर्व गांव के ही एक अति साधारण व्यक्ति को स्वप्न में स्वयं भगवान शिव के दर्शन हुए थे। महादेव ने उसे गंगा स्नान कर शिवलिंग पर जलाभिषेक करने का आदेश दिया। उस व्यक्ति ने पूर्ण निष्ठा के साथ महादेव की आज्ञा का पालन किया। उसी दिन से इस मंदिर में नियमित जलाभिषेक और पूजन-अर्चना की अटूट परंपरा अनवरत चली आ रही है।
आज तक नहीं बन सकी मंदिर की स्थायी छत
फिरोजपुर महादेव मंदिर की सबसे अनोखी और कौतूहल जगाने वाली विशेषता यह है कि आज तक इसके ऊपर कोई स्थायी छत नहीं बन पाई है। स्थानीय ग्रामीणों और श्रद्धालुओं ने कई बार मंदिर पर पक्की छत या भव्य गुंबद बनाने का प्रयास किया, लेकिन हर बार कोई न कोई ऐसी अनहोनी या रुकावट आई कि निर्माण कार्य अधूरा ही रह गया। इसी अलौकिक घटनाक्रम के कारण भगवान शिव आज भी खुले आकाश के नीचे विराजमान हैं। भक्त इसे महादेव की स्वेच्छा और लीला ही मानते हैं।
सावन और फाल्गुन में उमड़ता है जनसैलाब
प्रत्येक वर्ष सावन (श्रवण) और फाल्गुन मास के पावन अवसर पर यहाँ विशाल कांवड़ मेले का आयोजन होता है। इस दौरान उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि दिल्ली, हरियाणा, उत्तराखंड और राजस्थान सहित देश के कोने-कोने से लाखों की संख्या में कांवड़िए और शिवभक्त हरिद्वार से पवित्र गंगाजल लाकर यहाँ भोलेनाथ का जलाभिषेक करते हैं।