वहीं, शुक्रवार को लोकसभा के प्रथम चरण के चुनाव में क्षत्रिय समाज की नाराजगी दूसरी पार्टी के वोट बैंक में बदलती नजर आई। चौबीसी के क्षत्रिय बहुल गांवों की बात करें तो खेड़ा में जहां दूसरी पार्टी के लिए वोट पाना मुश्किल होता था वहां इस बार हालात बदले नजर आए। वोटिंग में उत्साह तो कम दिखा ही वहीं आधे वोटरों ने साफ कर दिया कि वे इस बार विरोध में हैं।
कुशावली, रार्धना, कपसाड़, ज्वालागढ़, अटेरना, चकबंदी, बड़कली, सलावा जितने भी चौबीसी के क्षत्रिय बाहुल्य गांव रहे, करीब-करीब सभी जगह यही स्थिति दिखी। यहां पर खूब साइकिल दौड़ी। महिलाओं और बुजुर्गों ने जरूर प्रदेश और देश के मुद्दों पर वोट डालने की बात कही, लेकिन युवा साफ तौर पर मुद्दों से अलग नजर आए। उनका कहना था कि हम स्थानीय मुद्दे पर ही वोट डाल रहे हैं।
कई गांवों में स्थिति ऐसी दिखी कि लोगों में वोटिंग को लेकर उत्साह कम था। सलावा गांव के एक युवा ने बताया कि वे हर साल एक ही पार्टी को वोट डालते रहे हैं, लेकिन इस बार विरोध कर रहे हैं। युवा ने बताया कि उन्होंने तो अपना वोट दूसरी पार्टी को डाल दिया, लेकिन उनकी माता ने वोट ही डालने से इंकार कर दिया। उनका कहना था कि दूसरी पार्टी को वोट देने का मन नहीं है। ये स्थिति कई गांवों में नजर आई।
क्षत्रिय समाज के लोगों का कहना था कि स्थानीय मुद्दे की वजह से ऐसा हो रहा है, जब वह विरोध कर रहे हैं। कई गांवों में जहां युवा नाराज थे वहीं, बुजर्गों और महिलाओं का कहना था कि इनको असलियत नहीं पता, हम नहीं भटक सकते हैं। पहले की तरह ही वोट देंगे।
दलित समाज रहा इस बार एकजुट
विधानसभा चुनाव में जहां दलित समाज का रुख अलग था। वहीं, शुक्रवार को हुए चुनाव में स्थिति उलट रही। अधिकतर गांवों में दलित समाज एकजुट नजर आया। उन्होंने साफ कहा कि चुनाव में किसी मुद्दे पर वोट नहीं कर रहे हैं। अपनी पार्टी को मजबूत करने का काम कर रहे हैं। इन इलाकों में हाथी खूब चिंघाड़ा। प्रजापति समाज ने भी अधिकतरों जगहों पर हाथी की सवारी की।
त्यागी समाज के वोटों में भी दिखा बिखराव
सरधना विधानसभा क्षेत्र में त्यागी समाज के वोटों में भी बिखराव दिखा। महादेव हो या फिर नंगला आर्डर-बेगमाबाद। लोगों का कहना था कि अपने समाज की ताकत भी तो दिखानी है। सरधना कस्बे में भी यही स्थिति नजर आई। त्यागी समाज दोफाड़ दिखा।
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