गांवों में रामलीला मंचन की अनोखी कहानियां बिखरी हैं। मेरठ में सरधना क्षेत्र के छुर गांव में करीब 125 वर्ष पूर्व दशरथ बने कलाकार की रामलीला मंचन के दौरान ही मृत्यु हो गई थी। यह सूचना राम बने रणधीर सिंह को मिली तो वह 14 वर्ष के लिए गांव से निकल गए। ठीक 14 वर्ष बाद रणधीर गांव लौटे तो उनका भव्य स्वागत किया गया। तभी से इस गांव में रामलीला का मंचन नहीं होता है।
रामलीला का जिक्र आते ही लोगों के मन में भक्ति भाव उमड़ने लगते हैं। सरधना के छुर गांव में रामलीला का मंचन अनोखे अंदाज में होता था। तब पूरे गांव को अयोध्या का रूप दिया जाता था। बताया जाता है कि 125 वर्ष पूर्व राम वियोग का मंचन चल रहा था। भाव विभोर लोग रामलीला में खोए हुए थे। जब राम के राज्यभिषेक की तैयारी चल रही थी, उसी समय कैकेयी ने राजा दशरथ को उनका वचन याद दिलाकर राम के लिए 14 साल के वनवास और अपने पुत्र भरत के राज्यभिषेक की मांग कर दी। राजा दशरथ ने कैकेयी की बात मान ली और राम व उनके साथ सीता और लक्ष्मण को वनवास के लिए जाना पड़ा। जैसे ही ये कलाकार गांव के बाहरी छोर पर पहुंचे पता चला कि दशरथ की भूमिका निभा रहे कलाकार की मृत्यु हो गई है। इसे सभी ने दैवीय घटना माना और राम बने रणधीर सिंह ने घर जाने से मना कर दिया। वह 14 साल के लिए फिजी चले गए।
चौदह साल बाद लौटे रणधीर सिंह
रणधीर सिंह की शादी रामलीला के आयोजन से दो माह पहले ही हुई थी। तब तक उनकी पत्नी ससुराल नहीं आई थी। उनके वंशज मास्टर राजेंद्र सिंह बताते हैं कि रणधीर सिंह पूरे 14 साल बाद फिजी से गांव लौटे थे। इसके बाद उनकी पत्नी का गौना हुआ। कुछ महीने बाद रणधीर फिर फिजी चले गए। जिसके एक साल बाद उनके एक पुत्र पैदा हुआ, जिनका नाम जयवीर रखा गया था।
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