19वीं सदी में संभ्रात परिवारों में पहने जाने वाले ड्रेप्स और काउल अब शहर में युवतियों-महिलाओं की पसंद बन रहे हैं। कॉलेज गोइंग लड़कियों से लेकर किटी में जाने वाली महिलाओं और नौकरीपेशा युवतियों को भी यह खूब भा रहे हैं। लांग कुर्ती और लांग टॉप के अलावा गाउन और फ्रॉक्स में युवतियां काउल व ड्रेप्स के डिजाइन ले रही हैं। शोरूम के साथ बुटीक पर भी इन दिनों ये डिजाइन खूब प्रचलन में हैं।
जॉर्जेट, सिल्क और रेयॉन में बन रहे ये ड्रेस
काउल और ड्रेप्स को विशेष तौर पर जॉर्जेट, सिल्क और रेयॉन के कपड़े में तैयार किया जा रहा है। चूंकि इस पैटर्न में ड्रेस में कई सारी सलिस्ट (चुन्नट) दी जाती हैं, जो कॉटन या हैवी कपड़े में नहीं बनती। ड्रेस डिजाइनर बताती हैं कि इसलिए नरम खासियत वाले कपड़े से ये ड्रेस तैयार होती हैं। ताकि आसानी से ड्रेस में 5 से 10 सलिट्स डाली जा सकें। इस ड्रेस को बनाने में 4 से 5 दिन का वक्त लगता है। मिक्स एंड मैच के अलावा कंट्रास्ट रंगों और सिंगल ओवरआल रंग में भी ये ड्रेस तैयार हो रहे हैं। ड्रेप्स पर कढ़ाई और ज्वैलरी का काम कर उसे और आकर्षक बनाते हैं।