इनके अलावा अन्य मदरसों के जिम्मेदारों और उलमा ने भी इस मुद्दे को सियासी मुद्दा करार दिया और कहा कि इस पर उलमा की राय कोई मायने नहीं रखती। यह काम सियासी लोगों का है।
उधर, जमीयत दावतुल मुसलीमीन के संरक्षक कारी इस्हाक गोरा ने कहा कि केंद्र सरकार को इतना बड़ा फैसला कश्मीरियों के मशविरे और उनको भरोसे में लेकर करना चाहिए था। दिलों पर राज कर फैसले लेना हमारे मुल्क की परंपरा रही है। इसकी सीमा का ख्याल रखा जाना चाहिए।
उनकी मांग है कि कश्मीरियों को किसी तरह की तकलीफ न पहुंचे सरकार को इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिए। हम उम्मीद करते हैं कि यह फैसला मुल्क के हित में बेहतर साबित हो।
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