बरतें सावधानी
स्मॉग में धुल के कण के साथ साथ सल्फर डाई ऑक्साइड जैसी नुकसानदायक गैस भी होती हैं। इनके असर से पर्यावरण में ऑक्सीजन कम हो जाती है। यह गैसें सांस के जरिये शरीर में जाकर नुकसान पहुंचाती हैं और इनसे अस्थमा अटैक भी आ सकता है। सांस रोगियों को ऐसे वातावरण में घर से बाहन निकलने से परहेज करना चाहिए। साथ ही अगर स्मॉग के रहते बारिश होती है तो इससे भी हानिकारक गैस पानी के साथ नीचे आएंगी। इस बारिश में नहीं भीगना चाहिए।
ऐसे आया स्मॉग
सिद्धांत के अनुसार हवा हमेशा गर्म क्षेत्र से ठंडे क्षेत्र की ओर बहती है। दिल्ली व आसपास के क्षेत्रों के मुकाबले बिजनौर ठंडा इलाका है। सिद्धांत के अनुसार स्मॉग वाली गरम हवा वातावरण में ऊपर उठकर बहते हुए जिले में आसमान में फैल जाती है।
प्राकृतिक रूप से साफ होगा स्मॉग
धूल के कण बारिश होने से जल्दी साफ होते हैं। इसके अलावा कणों के बार-बार नमी सोखने से भारी होकर भी नीचे बैठ जाते हैं। केवल प्राकृतिक रूप से ही ये नीचे बैठते हैं।
धीरे-धीरे कम होगा स्मॉग
उत्तराखंड विज्ञान एवं औद्योगिक परिषद में शोध में कार्यरत जिले के रहने वाले मयंक मलिक के अनुसार स्मॉग का असर धीरे-धीरे अपने आप कम होगा। स्मॉग का असर ज्यादा दिनों तक नहीं रहता है। श्वास के मरीज इस समय सावधानी बरतें।
नोट- इन खबरों के बारे आपकी क्या राय हैं। हमें फेसबुक पर कमेंट बॉक्स में लिखकर बताएं।
शहर से लेकर देश तक की ताजा खबरें व वीडियो देखने लिए हमारे इस फेसबुक पेज को लाइक करें
https://www.facebook.com/AuNewsMeerut/