देवबंद में इस्लामी तालीम के प्रमुख केंद्र दारुल उलूम ने ईद-उल-अजहा को लेकर जारी किए फतवे में कहा की जैसे नमाज़ पढ़ने से रोजा और रोजा रखने से नमाज़ का फर्ज अदा नहीं होता। उसी तरह अगर कोई शख्स क़ुरबानी करने के बजाए यह चाहे की वह जानवर या उसकी कीमत सदक़ा कर दे तो उसकी क़ुरबानी अदा नहीं होगी और इबादत छोड़ने का गुनाहगार होगा।
रविवार को दारुल उलूम के कार्यवाहक मोहतमिम मौलाना अब्दुल खालिक मद्रासी ने दारुल इफ्ता विभाग में मुफ़्तियों से लिखित में सवाल किए थे। जिसके जवाब में मुफ़्तियों की खंडपीठ ने कहा कि जिन मुसलमानों पर क़ुरबानी वाजिब है उनके लिए हर साल की तरह इस साल भी क़ुरबानी का अहतमाम (प्रबंध) करना लाजिम और ज़रूरी है।
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हदीस का हवाला देते हुए मुफ़्तियों ने कहा कि जो शख्स क़ुरबानी की हैसियत रखता है और क़ुरबानी न करे वे ईदगाह में न आए। साथ ही कहा कि क़ुरबानी का गोश्त (मांस) तीन हिस्सों में कर लिया जाए, एक हिस्सा अपने लिए, एक हिस्सा रिश्तेदारों के लिए और एक हिस्सा असहाय व ग़रीबों में बांट दिया जाए।
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