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दलितों के दो बड़े नेता जेल से बाहर, 2019 के लोकसभा चुनाव में कितना पड़ेगा असर

Fri, 28 Sep 2018 10:22 PM IST
कपिल कुमार, अमर उजाला, मेरठ
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चंद्रशेखर उर्फ रावण - फोटो : अमर उजाला
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लोकसभा चुनाव 2019 की तैयारी में सभी पार्टियां लगी हुई है। ऐसे में भाजपा दलितों को साधने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहती है। लेकिन पश्चिमी यूपी में दलितों को साधना बीजेपी के लिए इतना आसान नहीं होगा, क्योंकि जेल में बंद दलितों के दो बड़े नेता अब बाहर आ चुके हैं। जहां भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर के पीछे दलित युवाओं की बड़ी ताकत है तो वहीं बसपा के पूर्व विधायक और दो अप्रैल के दलित आंदोलन में जेल गए योगेश वर्मा भी बसपा की बड़ी ताकत है। अब सवाल है कि क्या योगेश और चंद्रशेखर दलितों को एक करने में सफल होंगे?

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अब दलितों के दोनों बड़े नेता जेल से रिहा
हाल ही में आपने देखा होगा कि उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने समय से दो महीने पहले ही भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर को जेल से रिहा कर दिया। चंद्रशेखर की रिहाई के बाद दलितों में खासा उत्साह भी देखने को मिला। यहां तक कि कई दिनों तक चंद्रशेखर के घर पर मिलने वालों का तांता लगा रहा और दिल्ली के मंत्री तक भी चंद्रशेखर से मिलने पहुंचे। इससे पहले पिछले साल चंद्रशेखर ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन किया था जिसमें उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली समेत कई राज्यों के दलित युवाओं ने हिस्सा लिया था। इसमें खास बात यह थी कि एक ही बार में इतनी बड़ी भीड़ इकट्ठा करना कोई आसान काम नहीं था। हालांकि चंद्रशेखर ने इसके लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया था। सोशल मीडिया पर दलित युवाओं से अपील की थी कि ज्यादा से ज्यादा संख्या में दलित युवा दिल्ली पहुंचे। जिसका असर देखने को भी मिला था। इतनी बड़ी संख्या में भीड़ को देख सभी राजनीतिक पार्टियों में हलचल पैदा हो गई थी। यही वजह है कि सहारनपुर हिंसा के बाद चंद्रशेखर दलितों का बड़ा नेता बनकर उभरा है।

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क्या दलितों को साधने में सफल होंने पूर्व विधायक योगेश वर्मा और चंद्रशेखर
वैसे तो आप देख ही रहे होंगे कि इन दिनों दलितों में भारी उत्साह है। उसकी यही वजह है कि पहले भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर जेल से रिहा होकर बाहर आए और अब बसपा के पूर्व विधायक योगेश वर्मा भी जेल से रिहा हो गए है। ऐसे में सवाल बनता है कि क्या योगेश वर्मा और चंद्रशेखर दलितों को एक करने में सफल होंगे। अगर ऐसा होता है तो 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा को फायदा मिल सकता है। हालांकि ऐसा होना कोई संभव नहीं है क्योंकि जहां चंद्रशेखर यह कहते नहीं थक रहे हैं कि मायावती उनकी बुआ है और उन्होंने अपने समाज के लिए बहुत काम किया है। लेकिन, वहीं मायावती ने हाल में दिए एक बयान में कहा था कि बुआ- भतीजे का कोई रिश्ता नहीं है। अब ऐसे में दलितों का पलड़ा किस ओर झुकेगा यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है।

सोशल मीडिया से बढ़ी दलितों में एकजुटता
उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती भले ही सोशल मीडिया का सहारा लेने में पीछे हो लेकिन, उनका समाज इस मामले में काफी आगे आ चुका है। जैसा कि आप देखते आ रहे हैं कि पहले सहारनपुर हिंसा के बाद दलितों ने सोशल मीडिया के जरिए एकजुटता बनाई। वहीं उसके बाद देश में हुए दो अप्रैल के दलित आंदोलन में सोशल मीडिया का अधिक सहारा लिया गया। और 2 अप्रैल को दलितों का बच्चा- बच्चा सड़कों पर उतर आया। इस दौरान मेरठ में भारी बवाल हुआ था जिसमें 500 से ज्यादा वाहन जला दिए गए थे और एक युवक की जान भी चली गई थी। इससे प्रदेश सरकार को भारी नुकसान भी उठाना पड़ा था। अब देखना यही है कि क्या दलित समाज सोशल मीडिया के जरिए 2019 के लोकसभा चुनाव में अपनी ताकत दिखाएगा।

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