निगम चुनाव में सपा की साइकिल से फिसला मुस्लिम मतदाता सपा को आगामी लोकसभा चुनाव में भी पसीना ला सकता है। नगर निगम चुनाव में भाजपा को रोकने को लिए मुस्लिम महापौर प्रत्याशी पद पर साइकिल छोड़ हाथी की सवारी करते दिखे। मुस्लिम इलाकों में साइकिल बस रेंगती नजर आयी। कुछ ही मुस्लिम वार्डों में जहां सपा का मजबूत पार्षद प्रत्याशी रहा, वहीं पर कुछ रूझान नजर आया।
शहर में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 3.40 लाख के आसपास है। बसपा के दलित समाज की वोट तीन लाख मानी जाती है। उप्र में सपा के शासनकाल में सत्ता सुख भोगने वाले मुस्लिम नेता भी मतदान स्थलों से दूर ही नजर आए। मुस्लिम इस तरह साइकिल का साथ छोड़ देंगे, ये सपा नेताओं के लिए आश्चर्य भरा है। निकाय चुनाव में सपा से मुस्लिमों की दूरी आगामी लोक सभा चुनाव पर भी असर डालती दिख रही है। मुस्लिम बाहुल्य इलाके जिनमें लिसाड़ी गेट, रसीदनगर, जाकिर कालोनी, भुमियापुल, कोतवाली, हापुड़ अडडा शाहपीर गेट, शास्त्रीनगर के मुस्लिम इलाके, हापुड़ रोड, घंटाघर, गुदडी बाजार, खैरनगर, जलकोठी, पूर्वा महावीर, बागपत गेट, मकबरा अब्बू, मछेरान, इम्लियान, करीमनगर, बुनकर नगर, इस्लामाबाद, शाहनत्थन, गुलजार इब्राहिम, कोटला, बनटान, ईदगाह आदि क्षेत्रों में मतदान स्थलों पर सपा, बसपा, भाजपा, कांग्रेेस, रालोद कार्यकर्ताओं की बात करें तो सबसे अधिक बसपा से महापौर प्रत्याशी सुनीता वर्मा के पक्ष में ही खड़े दिखे। ऐसा ही हाल महानगर के दलित बाहुल्य इलाके नई बस्ती लल्लापुरा, शिवपुरम, मलियाना, गोलाबड़, शेरगढ़ी, शास्त्रीनगर, जागृति विहार, कंकरखेड़ा, डोरली आदि में दिखने को मिला। दलित जाटव समाज इस बार बंटता नजर नहीं आया। जिसके कारण बसपाइयों के चेहरे खिलते दिख रहे हैं। हालांकि सभी महापौर और पार्षद प्रत्याशियों का भाग्य एवीएम मशीन में कैद है, लेकिन बसपाई अपनी जीत को मानकर चल रहे हैं।
भाजपा की राह में दलित - मुस्लिम गठबंधन ने अटकाये रोड़े
मेरठ। नगर निगम महापौर पद पर जैसा सोचा जा रहा था, वैसा ही नजर आया। मतदान का वक्त आते-आते मुस्लिम मतदाता भाजपा के खिलाफ लामबंद नजर आया। इसमें सधी हुई रणनीति के साथ मुस्लिम मतदाताओं ने बसपा के 2007 के दलित- मुस्लिम समीकरण को अंजाम दिया, जिससे महापौर पद पर सीधे सीधे मुकाबला भाजपा और बसपा के बीच सिमटा नजर आया।
सभी पार्टियों और प्रत्याशियों की नजर मुस्लिम मतदाताओं पर थी। क्योंकि मुस्लिम मतों के सहारे ही सपा या बसपा की नैया पार लगनी थी, तो उनके बंटवारे पर भाजपा को ही सीधे लाभ मिलना था। लेकिन जिस तरह प्रत्याशियों का प्रचार और रणनीति मतदान से पहले चल रही थी, उससे तस्वीर साफ होने लगी थी, कि मतदान के दिन मुस्लिम मतदाता बसपा के पक्ष में लामबंद खड़ा नजर आयेगा। मतदान के दिन सुबह से ही दलित और मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में बूथों पर लाइन लगनी शुरू हुई तो स्थिति आइने की तरह साफ हो गयी कि दोनों के बीच गठबंधन तगड़ा हो चला है।
मुस्लिम वोटों को अपने पक्ष में करने के लिए सपाइयों ने सुबह के वक्त कुछ प्रयास किया, लेकिन एक - दो घंटे में ही अपनी स्थिति को भांप सपाइयों ने हथियार डाल दिये और चुनाव खुला छोड़ दिया। इसके बाद शहर के लगभग हर वार्ड में महापौर सीट पर भाजपा और बसपा के बीच ही लड़ाई नजर आयी। कहीं पर भाजपा एक तरफ बढ़त लेती दिख रही थी, तो कहीं पर बसपा हाथी चिंघाड़ रहा था। मिश्रित आबादी वाले क्षेत्रों में दोनों के बीच टक्कर नजर आयी। इन दोनों के बीच कहीं सपा तो कहीं कांग्रेस और रालोद भी हलकी सेंधमारी करते नजर आये।