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दो लिपिक गिरफ्तार

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निरस्त भूखंडों की रजिस्ट्री के खेल में दो लिपिक गिरफ्तार
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मेरठ। निरस्त भूखंडों को फर्जी तरीके से बेचकर लाखों के वारे न्यारे करने के मामले में आयुक्त डॉ. प्रभात कुमार ने एमडीए कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई करा दी। गड़बड़झाला करने पर एक वर्तमान तथा सेवानिवृत्त लिपिक को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया, जबकि एक अन्य आरोपी महिला लिपिक फरार हो गई। इन सभी के खिलाफ थाना सिविल लाइन में मुकदमा दर्ज कराया गया है। इस पूरे गड़बड़झाले का भंडाफोड़ अमर उजाला ने किया था और उसी पर चल रही जांच के बाद यह कार्रवाई हुई है। इसके अलावा इसी तरह की सभी पत्रावलियों की जांच करने और यदि संपत्ति खाली है तो उस पर तत्काल एमडीए को कब्जा लेने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही ऐसे सभी बयानों को निरस्त करने को भी कहा है।

यह है पूरा प्रकरण
एमडीए की लोहियानगर योजना में 625 तथा 900 रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर पर भूखंडों का आवंटन किया गया था। वर्ष 1998 में काफी प्लॉट ऐसे रहे, जिनमें आवंटियों ने केवल दस और पांच प्रतिशत रकम ही जमा कराई। बाद में किश्त जमा न होने पर इन भूखंडों को निरस्त कर दिया गया। इनमें 300 तथा 114 वर्ग मीटर के प्लॉट सबसे ज्यादा शामिल थे।
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एमडीए कर्मियों ने कर दिया बड़ा खेल
जब एक मुश्त समाधान योजना आई तो एमडीए कर्मचारियों ने पूरे खेल की पटकथा रच दी। निरस्त प्लॉटों केखाते में एमडीए कर्मचारियों ने अपनी जेब से ही दो से चार लाख रुपये तक डालकर उनकेअकाउंट को पुनर्जीवित कर दिया। हालांकि इनका वर्तमान रेट तो कहीं ज्यादा था पर इस गेम को पूरा करने केलिए यह काम किया गया। इसके बाद फर्जी लोग तैयार किए गए। फाइल पर लगी निरस्तीकरण की नोटशीट फाड़ दी गई और अपने द्वारा ही खड़े किए गए लोगाें को मूल आवंटी बताते हुए उनके नाम रजिस्ट्री कर दी गई। रजिस्ट्री पर फोटो तक फर्जी लगाए गए।

कई कई बार बिके प्लॉट
अहम यह रहा कि इन प्लॉटों की बिक्री भी कई कई बार हुई। उन लोगों में से भी कुछ ने आगे प्लॉट बेच दिए और एमडीए को पांच से सात करोड़ रुपये का चूना लगाया। दरअसल उस समय रेट 625 और नौ सौ का था पर अब यहां रेट 12 हजार केपार है। ऐसे में लाखों रुपये एमडीए कर्मियों की जेब में गए।

रिपोर्ट तक लगाई फर्जी
यह पूरा पैसा एमडीए कर्मचारियों की जेब में गया। जो पैसा एमडीए में जमा होना चाहिए था वह हुआ ही नहीं। कर्मियों ने यहां फर्जी रिपोर्ट तैयार की। रजिस्ट्री की फाइलों पर पैसा जमा होने की जो रसीद लगती है उसका मिलान कंप्यूटर सेक्शन से होता है पर फाइल में लिखा जाता है कि संलग्नक रसीदों का मिलान कंप्यूटर सेक्शन के लेखा अनुभाग से किया गया। यह नहीं लिखा गया कि कितने रकम का मिलान हुआ और किस भूखंड संख्या में पैसा जमा हुआ।

अमर उजाला ने किया था भंडाफोड़
इस गड़बड़झाले की खबर को अमर उजाला ने तीन नवंबर 2016 के अंक में प्रमुखता से प्रकाशित किया था। ऐसे 19 भूखंडों की संख्या समेत पूरा खुलासा किया गया। यह भी बताया कि इस योजना में कैसे खेल हुआ। इस पर कई खबरें प्रकाशित की गईं। यह भी बताया कि इस प्रकरण में गवाह भी फर्जी थे। रजिस्ट्री में फिल्म स्टारों के नाम गवाह के रूप में दर्ज हैं।

आयुक्त की जांच में खुला पूरा खेल
इस पूरे प्रकरण में आयुक्त डॉ. प्रभात कुमार ने वीसी साहब सिंह से जांच कराने को कहा। जांच कमेटी में शामिल तहसीलदार एमडीए मनोज कुमार सिंह, तत्कालीन वित्त एवं लेखाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह यादव, संयुक्त सचिव अजय कुमार ने जांच कर रिपोर्ट दी, जिसमें साबित हो गया कि खेल किया गया। टीम की रिपोर्ट के आधार पर आयुक्त ने लिपिक शिवगोपाल वाजपेयी, लिपिक रजनी कनौजिया तथा रिटायर्ड हुए लिपिक तारा चंद समेत अन्य के खिलाफ एफआईआर कराने के निर्देश दिए। रजनी को निलंबित कर बर्खास्तगी की कार्रवाई शुरू कर दी गई है।

धर दबोचे आरोपी
इस प्रकरण में बृहस्पतिवार को कार्रवाई हुई। आयुक्त के निर्देश पर थाना सिविल लाइन पुलिस एक्शन में आ गई। इस खेल को अंजाम देने के आरोपी लिपिक शिवगोपाल वाजपेयी को लगभग डेढ़ बजे एमडीए कार्यालय से बाहर बुलाया और गिरफ्तार कर लिया गया। पांडव नगर निवासी रिटायर्ड लिपिक तारा को उनके आवास से गिरफ्तार किया गया। लिपिक रजनी कनौजिया के आवास पर भी पुलिस पहुंची पर वह नहीं मिलीं। सीओ सिविल लाइन श्रीराम अर्ज के मुताबिक इस मामले में संयुक्त सचिव अजय कुमार की ओर से इन तीनों आरोपियों के साथ साथ अन्य पर 420, 467, 468, 471, 120 बी की धाराआेें में थाना सिविल लाइन में मुकदमा पंजीकृत किया गया है।
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यह बात साबित हो रही है कि एमडीए में निरस्त भूखंडों की बिक्री में बड़ा खेल हुआ है। भ्रष्टाचार की इन परतों को पूरी तरह से हटाना होगा। इन लिपिकों पर तो एक्शन किया ही गया है, अन्य सभी शामिल लोगों पर भी कार्रवाई होगी। मैंने सभी पत्रावलियाें की जांच को कहा है ताकि अन्य मामले भी सामने आ सकें। साथ ही इन बैनामों को निरस्त करने को भी कहा है। - डॉ. प्रभात कुमार, आयुक्त
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