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चिंतन से संस्कृति और चारित्र का होता है विकास : आचार्य सौरभ

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जैन आगमों को अक्षरबद्ध करने की चिंता ने बचाया जैन दर्शन का इतिहास
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19 अगस्त को होगा श्री 1008 पार्श्वनाथ निर्वाण महामहोत्सव
संवाद न्यूज एजेंसी
मेरठ। आचार्य सौरभ सागर का वर्षा योग महानगर सहित दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं में उत्साह और संस्कारों का संचार कर रहा है। बृहस्पतिवार को बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने आचार्य की चरण वंदना कर भक्ति की।
आचार्य सौरभ सागर ने कहा कि गृहस्थ के मन में परिवार, बच्चों की आजीविका और भविष्य को लेकर चिंता रहती है। कभी-कभी संतों को भी चिंता होती है। हर चिंता बुरी नहीं होती। यदि चिंता में चिंतन, शुभता, संस्कृति के विकास और भावी पीढ़ी के कल्याण की भावना हो तो वही चिंता हमारे भीतर चारित्र प्रकट करने वाले पुरुषार्थ का कारण बनती है और साहित्य के रूप में सामने आती है।
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उन्होंने कहा कि करीब 2000 वर्ष पूर्व महान आचार्य धरसेन को भी चिंता हुई थी कि मनुष्य की स्मृति कमजोर होती जा रही है। उन्हें चिंता थी कि यदि जैन आगमों के वर्णन को अक्षरबद्ध नहीं किया गया तो जैन दर्शन लुप्त हो जाएगा। आचार्य ने वर्तमान समय का उदाहरण देते हुए कहा कि पहले लोग कई फोन नंबर याद रखते थे लेकिन अब तकनीक पर निर्भरता के कारण अपना फोन नंबर भी याद रखना कठिन हो गया है।
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