आबिद हुसैन बताते हैं कि 1960 में एक गड्डी (149 पीस) चांदी के वरक के दाम चार आने मिलते थे। अब 110 रुपये कीमत है। इसे बनाने का हुनर पीढ़ी दर पीढ़ी ट्रांसफर हो रहा है। आबिद हुसैन ने अपने मामा से सीखा था। अब उनके बेटे जावेद और मुरसलीन के हाथ भी वर्क बनाने में हुनरमंद हो चुके हैं। बकौल आबिद अब तक वह 700 कारीगर तैयार कर चुके हैं। उन्हीं में से मोबिन और जावेद हैं। जिनके हाथ और हथौड़े के बीच का तालमेल भी गजब का है। छोटे-छोटे से चांदी के पतरों को सात इंच के वरक में तब्दील करने की प्रक्रिया को देखना भी मधुर संगीत को सुनने से कम नहीं है।
तैयार किए सोमनाथ मंदिर के कलश
कांशी के कारीगर सोने के भी वरक बनाते हैं। जावेद और मुरसलीम रविवार को ही दिल्ली से लौटे हैं। वहां गुजरात के सोमनाथ मंदिर के विशाल कलश और कुछ मूर्तियां लाई गई थीं, जिन्हें स्वर्ण मंडित किया गया। मुरसलीम ने बताया कि वह 12 साल से मंदिर के कलश और मूर्तियों को स्वर्णमंडित करने का काम कर रहे हैं।
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