ज्योतिषाचार्य विनोद त्यागी ने बताया कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा 30 मार्च को है। इस वजह से नवरात्रि रविवार को शुरू होगी। पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाएगी। लेकिन, द्वितीया और तृतीया तिथि 31 मार्च को एक ही दिन लग रही है। इसलिए तृतीया तिथि का क्षय हो रहा है। इस कारण चैत्र नवरात्रि पर आठ दिन ही व्रत रखा जाएगा। 31 मार्च द्वितीया तिथि में मां ब्रह्मचारिणी पूजन सुबह 9:12 बजे तक होगा।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन रहेगा रेवती नक्षत्र
निर्णय सिंधु और भारतीय ज्योतिष शास्त्रियों के अनुसार नवरात्रि पूजन द्विस्वभाव लग्न में करना शुभ होता है। मिथुन, कन्या, धनु तथा कुंभ राशि द्विस्वभाव राशि है। अत: इसी लग्न में पूजा प्रारंभ करनी चाहिए। रविवार 30 मार्च को चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन रेवती नक्षत्र के साथ अश्विनी नक्षत्र और ऐंद्र योग होने के कारण बेहद शुभ होगा। ज्योतिष शास्त्र में इसको स्वयं सिद्ध मुहूर्त माना गया है। इस मुहूर्त में पूजा तथा कलश स्थापना शुभ होगी।
कलश होता है सुख-समृद्धि का प्रतीक
धर्मशास्त्रों के अनुसार कलश को सुख-समृद्धि, वैभव और मंगल कामनाओं का प्रतीक माना गया है। कालिका पुराण के अनुसार कलश के मुख में विष्णुजी का निवास, कंठ में रुद्र तथा मूल में ब्रह्मा स्थित हैं। कलश के मध्य में दैवीय मातृ शक्तियां निवास करती हैं। देवता, सातों दीप, सातों समुद्र, सभी नक्षत्र, ग्रह, कुलपर्वत, गंगादि सभी नदियां, चारों वेद सभी कलश में ही स्थित हैं।
दिन के अनुसार होती है माता की सवारी
नवरात्र सोमवार या रविवार से शुरू हो रहे हैं तो मां का वाहन हाथी होता है, जो अधिक वर्षा के संकेत देता है। वहीं, यदि नवरात्र मंगलवार और शनिवार शुरू होती हैं तो मां का वाहन घोड़ा होता है। जो सत्ता परिवर्तन का संकेत देता है। इसके अलावा बृहस्पतिवार या शुक्रवार से शुरू होने पर मां दुर्गा डोली में बैठकर आती हैं। जो रक्तपात, तांडव, जनधन हानि का संकेत बताता है। बुधवार के दिन से नवरात्र की शुरुआत होती है तो मां नाव पर सवार होकर आती हैं। अपने भक्तों के सारे कष्ट को हर लेती हैं।