बाहर से दवा लेने पर भी उठे सवाल
केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट एसोसिएशन जिला सहारनपुर के महासचिव प्रदीप लूथरा ने बताया कि कुछ मामलों में मरीज बाहर से दवा खरीदकर अस्पताल ले जाते हैं तो डॉक्टर उसे लेने से मना कर देते हैं। इसके बाद तीमारदारों को दवा वापस करनी पड़ती है। उन्होंने यह भी बताया कि कई बार डॉक्टरों के पर्चे ऐसे होते हैं, जिनकी लिखावट समझना मुश्किल होता है। उनके अनुसार, कुछ पर्चे कोड वर्ड में लिखे होने की बात भी सामने आई है।
प्रदीप लूथरा ने कहा कि दवाओं की कीमतों को लेकर सरकार की कोई स्पष्ट नीति नहीं है। उन्होंने ड्रग प्राइस कंट्रोल अथॉरिटी एक्ट का जिक्र करते हुए कहा कि संबंधित दवा उसके अधीन नहीं होने के कारण कंपनियां एमआरपी तय करती हैं।
एक साल तक चला इलाज, महंगी दवाओं ने बढ़ाया खर्च
शिवाजी नगर निवासी अमिता शर्मा ने बताया कि करीब दो साल पहले जांच के दौरान उन्हें कैंसर का पता चला था। उस समय त्वचा के कैंसर की शुरुआती स्टेज थी। इसके बाद एक निजी अस्पताल में करीब एक साल तक इलाज चला। उन्होंने बताया कि इलाज के दौरान महंगी दवाओं का खर्च उठाना मुश्किल हो गया था। नियमित इलाज के बाद उन्होंने कैंसर को मात दी।
अलग-अलग जगहों पर दवा की कीमत में अंतर
उपलब्ध फैक्ट फाइल के अनुसार, संबंधित दवा की कीमत में अलग-अलग स्तर पर अंतर बताया गया है। होलसेल मेडिकल स्टोर पर कीमत करीब 700-750 रुपये, रिटेल मेडिकल स्टोर पर 3400-3500 रुपये और निजी अस्पताल में 500-550 रुपये बताई गई है। वहीं एक दवा की खरीद कीमत 300 रुपये और एमआरपी 4867 रुपये तक दर्ज होने की जानकारी सामने आई है।
शासन को अवगत कराया जाएगा: सहायक आयुक्त औषधि
सहायक आयुक्त औषधि नरेश मोहन दीपक ने कहा कि अभी उनके पास इस तरह का कोई मामला नहीं आया है। अगर दवाओं के रेट में अंतर है तो शासन को अवगत कराया जाएगा। शासन से जो दिशा-निर्देश मिलेंगे, उनके आधार पर कार्रवाई की जाएगी।