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ब्रांडेड की छाप, असली-नकली में फर्क भूल जाएंगे आप

Mon, 30 May 2016 02:18 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
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फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
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 अगर आप ब्रांडेड सामान खरीदने निकले हैं तो सावधान हो जाएं। शहर में कई मार्केट ऐसी हैं जहां ब्रांडेड की मुहर के नाम पर बहुत बड़ा धोखा चल रहा है। हर चीज पर यहां ब्रांडेड के नाम पर धड़ल्ले से बेची जा रही है। शोरूम से रेट कम होने के बावजूद भी आपको ऐसा बताया जाएगा कि आप असली-नकली में फर्क करना भूल जाएंगे।
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लेकिन असल में ये ब्रांडेड नहीं बल्कि नकली माल पर ब्रांडेड की मुहर लगाकर उसे असली के नाम पर बेचने का गोरखधंधा है। ‘अमर उजाला’ ने शहर में कई जगह इस ब्रांडेड के नाम पर नकली के खेल की पड़ताल की तो सच सामने आया।  
केस एक: लालकुर्ती का बाजार कहने को तो पैंठ बाजार कहा जाता है। लेकिन इस मार्केट के भीतर एक डी मार्केट और चाइनीज मार्केट में भारी भीड़ रहती है।
यहां आपको जूते, जींस, बैग, मोजे, अंडरगारमेंट्स सभी ब्रांडेड कंपनियों के सस्ते दाम पर मिल जायेंगे। अमर उजाला रिपोर्टर ने यहां जूतों की पड़ताल की। एक दुकान पर ब्रांडेड जूते नजर आये। जिसमें नाइक का जूता 1600 रुपये का बताया गया। इस जूते की कंपनी के शोरूम पर कीमत 3300 रुपये है।
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पूछने पर दुकानदार ने बताया कि यह सेकेंड का माल है। इसमें मैन्यूफैक्चरिंग डिफेक्ट होता है। ऐसे में कंपनी ऐसे जूतों को सस्ते दामों पर दे देती है। इस दुकान पर एडिडास और रिबोक के जूते भी नजर आये।
केस दो: लालकुर्ती में ही एक अन्य दुकान पर ब्रांडेड जूते मिल रहे थे। स्पार्क के जूते की कीमत यहां एक हजार रुपये बतायी गयी। जबकि शोरूम पर इसकी कीमत 1600 रुपये होने का दावा दुकानदार ने किया। काफी देर चर्चा में इस दुकानदार ने स्वीकार किया कि यह फर्स्ट कॉपी माल है। फर्स्ट कॉपी मतलब हूबहू नकल करके बनाया गया माल।
इसके बाद दुकानदार इस जूते को 600 रुपये में देने के लिए तैयार हो गया। केस तीन: सदर स्थित एक दुकान पर स्कूल बैग तलाशा गया। अमेरिकन टूरिस्टर कंपनी का जो बैग 1200 रुपये से स्टार्ट होता है। यहां पर वह बैग 800 रुपये का बताया गया। जब सौदा तय हुआ तो दुकानदार बैग 500 रुपये तक में देने के लिए तैयार हो गया।
लेकिन असली-नकली का पता लगाने पर पता चला कि यह बैग भी नकली है और ब्रांड की मुहर लगा दी गयी है। ऐसे बैग बाजार में बगैर मुहर के 300 रुपये तक मिल जाते हैं। ऐसा ही लैपटॉप बैग में खेल नजर आया। एचपी की मुहर लगे इस बैग की कीमत जहां कंपनी 1500 रुपये बताती है। वहीं दुकानों पर यह बैग 700 रुपये का बिकता मिला। इसमें भी पता चला कि सिर्फ ब्रांड का नाम दिया गया है। वास्तव में इसकी कीमत 300-400 रुपये ही है।

इनमें भी है ब्रांड का खेल
शहर में चश्मों की दुकानों पर भी खेल है। फास्ट ट्रैक, रेबन आदि तमाम ब्रांडेड कंपनियों के चश्मे सस्ते दामों पर बिक रहे हैं। इनके ऊपर सिर्फ मुहर लगी है और युवा टशन दिखाने के चक्कर में बहुत ही सस्ता माल ब्रांडेड के फेर में खरीदकर लुट रहे हैं।
यही नहीं तमाम ब्रांडेड कपड़े जैसे लिवाइस और किलर आदि की जींस जो तीन हजार या उससे ज्यादा कीमत पर बाजार में मिलती है। वह यहां पर 1500-2000 की बिकती है। जबकि इन पर भी सिर्फ मुहर लगायी जाती है। ऐसा ही कारनामा वुडलैंड जैसी नामचीन कंपनी के नाम पर हो रहा है। जिसके जूते से लेकर जैकेट तक बाजार में नकली मिलती है।

ये है नकली का खेल
सबसे बड़ा खेल फर्स्ट कॉपी के नाम पर हो रहा है। महंगी घड़ियोें से शुरू हुआ यह खेल अब कपड़े और जूतों में भी आ गया है। पहले अरमानी, रॉडो, गूसी आदि ब्रांडेड घड़ियां जिनकी रेंज ही 30-40 हजार से शुरू होती है।
उनकी फर्स्ट कॉपी का चलन आया था। इन घड़ियों की हूबहू कॉपी वाली घड़ियां बाजार में 5 से 10 हजार रुपये में उपलब्ध हैं। लेकिन अब यह फर्स्ट कॉपी का चलन अन्य सामान में भी रहा है। जबकि जानकारों की मानें तो घड़ियों में फर्स्ट कॉपी के लिए जरूर लागत लगायी जाती है। लेकिन जूते, चश्मे और कपड़ों में तो सिर्फ मुहर लगाकर ही उसे ब्रांडेड किया जा रहा है।

तीन से चार गुना लाभ
इस फर्स्ट कापी और सेकेंड के नाम पर नकली को असली बताकर बेचने वाले दुकानदार बहुुत मोलतोल के बावजूद भी तीन से चार गुना कमाई कर रहे हैं। लेकिन ग्राहक असली के धोखे में नकली खरीदकर भी खुद को ठगा हुआ महसूस नहीं कर रहा है।
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