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हालात : किडनी का भी दुश्मन बन रहा ब्लैक फंगस, यहां सामने आए कई मामले

Fri, 04 Jun 2021 03:15 PM IST
मेरठ ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ

सार

किडनी के मरीजों पर ब्लैक फंगस का खतरा ज्यादा बढ़ रहा है। यहां ऐसे कई मामले सामने आए हैं। पढ़िए पूरी रिपोर्ट।
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ब्लैक फंगस - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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मेरठ में ब्लैक फंगस (म्यूकर माइकोसिस) के मरीजों में एंबिसोम यानि लाइपोसोमल एंफोटेरिसिन-बी इंजेक्शन की डिमांड तेजी से बढ़ी है। इसके इलाज के लिए इंजेक्शन का ही इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन ये इंजेक्शन किडनी पर तेजी से असर करते हैं। क्रिएटिनिन, सीरम पोटेशियम और मैग्नीशियम बढ़ाकर किडनी को नुकसान पहुंचाते हैं। इसलिए चिकित्सक इसे लेकर सावधानी बरत रहे हैं। किडनी रोग विशेषज्ञ की देखरेख में इन इंजेक्शन को दिया जा रहा है।

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कोविड के बाद अब ब्लैक फंगस (म्यूकर माइकोसिस) बढ़ता जा रहा है। इसके केस दिन प्रतिदिन बढ़ते ही जा रहे हैं। मेरठ में 220 से ज्यादा मरीज मिल चुके हैं। 18 की मृत्यु हो चुकी है। 125 से ज्यादा सक्रिय मामले हैं। 40 से अधिक मरीजों के ऑपरेशन किए जा चुके हैं। ब्लैक फंगस के मरीज का इलाज ऑपरेशन और एंबिसोम यानि लाइपोसोमल एंफोटेरिसिन-बी इंजेक्शन से ही संभव है। मरीज को एक दिन छह इंजेक्शन दिए जाते हैं। एक इंजेक्शन में 50 मिली ग्राम डोज होती है, ऐसे में प्रतिदिन 300 एमएल डोज दी जाती है। यह इंजेक्शन चार से छह सप्ताह तक लगातार चलते हैं। यह इंजेक्शन किडनी के लिए काफी स्ट्रांग होते हैं। इसलिए प्रतिदिन ब्लड टेस्ट कराया जाता है, इसमें देखा जाता है कि यूरिक एसिड की स्थिति क्या है। यूरिक एसिड अगर बढ़ा होता है तो यह इंजेक्शन रोक दिए जाते हैं। ब्लैक फंगस के मरीजों का इलाज कर रहे चिकित्सक बेहद सावधानी बरत कर इंजेक्शन दे रहे हैं। जरा सी लापरवाही घातक साबित हो सकती है। एंबिसोम यानि लाइपोसोमल एंफोटेरिसिन-बी इंजेक्शन का इस्तेमाल कालाजार (ब्लैक फीवर) के इलाज में कई सालों से हो रहा है। एंफोटेरिसिन-बी में एक ऐंटीफंगल दवा है जो गंभीर फंगल इंफेक्शंस के इलाज में भी इस्तेमाल होती है। म्यूकर माइकोसिस के अलावा कई अन्य फंगल इन्फेक्शंस का इलाज भी एंफोटेरिसिन-बी के जरिए होता है।

एंफोटेरिसिन-बी के साइड इफेक्ट्स भी कई हैं इसलिए इसे गंभीर इन्फेक्शंस की स्थिति में या ऐसे मरीजों को दिया जाता है, जिनका इम्युन सिस्टम बेहद कमजोर हो। कई मरीजों में इंजेक्शन लगने के कुछ देर बाद ही तेज बुखार, हाइपोटेंशन, जी मिचलाना, सिरदर्द, सांस फूलना जैसी दिक्कतें आती हैं। धीरे-धीरे रिएक्शन धीमा पड़ता जाता है।

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दो मरीजों को परेशानी हुई
11 मरीजों का इलाज किया है। इनमें से दो मरीजों की किडनी पर इंजेक्शन का नकारात्मक असर हुआ है। इससे क्रिएटिनिन काफी बढ़ जाता है। - डॉ संदीप गर्ग, गुर्दा रोग विशेषज्ञ

सावधानी बरतनी जरूरी
पांच मरीजों का इलाज किया है। इंजेक्शन देते समय बहुत सावधानी बरतनी पड़ती है। लगातार निगरानी करनी होती है। इसमें पोटेशियम और मैग्नीशियम भी काफी बढ़ जाता है। - डॉ. प्रदीप कुमार, गुर्दा रोग विशेषज्ञ

केस-1
गढ़ रोड के एक मरीज को ब्लैक फंगस होने पर जब निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया तो उनकी किडनी ठीक थी। लेकिन एक सप्ताह के इलाज के बाद जांच कराई तो क्रिएटिनिन काफी बढ़ा हुआ आया।

केस-2
मवाना के एक व्यक्ति का ब्लैक फंगस का इलाज चल रहा है। उसे इंजेक्शन लगाए जा रहे हैं। जांच होती है तो क्रिएटिनिन के साथ- साथ पोटेशियम और मैग्नीशियम बढ़ा हुआ आ रहा है। अब किडनी बचाने पर भी जोर है।
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