माना जा रहा है कि यह सियासी दल एक वर्ग को खुश करने को दूसरे वर्ग की नाराजगी का रिस्क नहीं लेना चाहते हैं। कांग्रेस का एक धड़ा ही लंबे समय भीम आर्मी के साथ लामबंद है, जो दलित-मुस्लिम समीकरण के सहारे चुनावी नैय्या पार लगाने की जुगत में लगा हैं। हालांकि रावण ने भाजपा के खिलाफ बनने वाले गठबंधन को समर्थन का ऐलान कर भीम आर्मी के रुख को एक तरह से साफ कर दिया है।
भीम आर्मी के गठन के बाद से कांग्रेस को छोड़कर दूसरे सियासी दलों ने खुद को अलग रखा है। दूधली में शोभायात्रा निकालने को लेकर सांसद राघव लखन पाल शर्मा और उनके भाई राहुल लखनपाल से तकरार के बाद भाजपा और भीम आर्मी में ठन गई थी। बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल ने तो भीम आर्मी को ज्यादा तवज्जो नहीं दी। कांग्रेस के पूर्व विधायक इमरान मसूद जरूर भीम आर्मी प्रमुख के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे।
कैराना उप चुनाव में भीम आर्मी ने खुद ही गठबंधन प्रत्याशी को समर्थन देने की घोषणा कर भाजपा विरोधी दलों से नजदीकियां बढ़ाई। योगी सरकार के बृहस्पतिवार को भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर उर्फ रावण को रासुका में 48 दिन पहले रिहा करने के फैसले को लेकर खुद भाजपा कुछ भी बोलने से कतराती रही। भाजपा नेताओं ने रिहाई को लेकर किसी तरह की बयानबाजी से परहेज किया। अलबत्ता रिहाई के बाद रावण ने जिस तरह पार्टी को टारगेट किया, उससे भाजपा नेतृत्व को जरूर बेचैन कर दिया है।
बहुजन समाज पार्टी तो पहले से ही भीम आर्मी से बचती रही। बसपा प्रमुख मायावती ने एक बार जरूर भीम आर्मी के गठन को लेकर सवाल उठाए थे। जेल से रिहाई के बाद रावण ने बसपा सुप्रीमो मायावती को बुआ बताते हुए तारीफ की, उससे जरूर बसपा से भविष्य में अच्छे रिश्ते बनाने का संकेत मिला है। समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल नेताओं ने रावण की रिहाई को लेकर कुछ भी कहने से गुरेज किया।
भीम आर्मी की गतिविधियों पर खास नजर
भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर उर्फ रावण की रिहाई के बाद संगठन की तमाम गतिविधियों पर खुफिया विभाग की नजर है। रावण से मिलने वालों के साथ भीम आर्मी पदाधिकारियों पर खास फोकस है। गृह विभाग भी रावण की रिहाई के बाद जिले के हालातों में कई बार समीक्षा कर चुका हैं।
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