यह होता है बायो फ्लोक
बायो फ्लॉक विधि में मछली पालन में भी जैविक विधि अपनाई जाती है। तालाब के पानी में मछली मल करती हैं। इस मले के अधिक संख्या में एकत्रित होने से पानी में अमोनिया बढ़ जाता है। अमोनिया मछलियों के लिए जहर का काम करता है। इससे मछली मर जाती हैं। बायो फ्लॉक विधि में जार में बैक्टीरिया पैदा की जाती हैं। यह बैक्टीरिया मछली के 20 प्रतिशत मल को प्रोटीन में बदल देता है। मछली इस प्रोटीन को खा लेती हैं। बचा मल जार में नीचे जमा हो जाता है। इसे टोंटी के जरिये निकाल दिया जाता है। मछलियों को कोई नुकसान नहीं होता है।
ऐसे ज्यादा विकसित होती हैं मछली
बायो फ्लॉक विधि में जार में हर चीज इंसानी कंट्रोल में होती है। तालाब में मछली का दाना ज्यादा गिरने या मल से अधिक केमिकल बनते हैं। इन्हें निकालने का साधन नहीं होता है। पानी में ऑक्सीजन घुलनी बंद हो जाती है। पानी में ऑक्सीजन घोलने के लिए तरह तरह के केमिकल डाले जाते हैं। जबकि जार में वेस्टेज को निकालने का पूरा साधन होता है। मछलियों को ज्यादा खुराक देने पर भी उन्हें नुकसान नहीं होता।
पानी और बिजली का दोहन कम
तालाब में हर साल लाखों लीटर पानी का दोहन होता है। एक हेक्टेयर के तालाब में हर समय एक दो इंच के बोरिंग से पानी दिया जाता है। जबकि बायो फ्लॉक विधि में चार महीने में केवल एक ही बार पानी भरा जाता है। गंदगी जमा होने पर केवल दस प्रतिशत पानी निकालकर इसे साफ रखा जा सकता है। जार से निकलवे वाला पानी खेतों में छोड़ा जा सकता है।
नहीं होगा नुकसान
तालाब के पास किसान को हर समय निगरानी रखनी पड़ती है। इंसानी नुकसान के अलावा बगुला आदि भी मछली खा जाते हैं। जबकि बायो फ्लॉक वाले जार के ऊपर शेड लगाया जाता है। इससे पानी भी वाष्पित नहीं होता है और पक्षी भी मछली नहीं खाते हैं।
अधिक लाभ कमा सकते हैं किसान
प्रभारी आत्मा परियोजना बिजनौर योगेंद्रपाल सिंह योगी के अनुसार कृषि विविधीकरण को अपनाकर ही किसानों की आय में बढ़ोतरी की जा सकती है। बायो फ्लॉक विविधीकरण का उचित माध्यम है। बायो फ्लॉक से मछली पालन कर किसान अधिक लाभ कमा सकते हैं।
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