यह है लाभ का गणित
रासायनिक खेती में गन्ना प्रति बीघा 70 क्विंटल निकलता है। इससे किसान को करीब 23 हजार रुपये मिलते हैं। इस बार गन्ने की पैदावार कम है। जैविक खेती से बोया गन्ना 50 क्विंटल तक निकल रहा है। 50 क्विंटल गन्ने में सवा पांच क्विंटल तक गुड़ निकल रहा है। यह 6500 रुपये प्रति क्विंटल तक बिक रहा है।
इसकी कीमत 34 हजार रुपये से अधिक है। प्रति क्विंटल गुड़ बनाने के प्रति क्विंटल 1100 रुपये तक ले रहे हैं। प्रति बीघा गन्ने के साढ़े पांच हजार रुपये तक खर्च आता है। लागत निकालने के बाद भी किसान को रासायनिक गन्ने के मुकाबले साढ़े पांच हजार रुपये बीघा अतिरिक्त मिलेंगे।
तो और बढ़ेगा मुनाफा
पहले साल में ही किसानों को फसल के बंपर रेट मिले हैं। तीन साल तक लगातार जैविक खेती करने पर किसानों को कृषि विभाग से जैविक खेती के प्रमाण पत्र मिल जाएंगे। जो जैविक गुड़ अब 65 रुपये प्रति किग्रा बिक रहा है इसके रेट 100 रुपये प्रति किग्रा तक मिल सकते हैं।
जैविक पेस्टीसाइट भी मिलेंगे
जैविक खेती करने वाले किसानों को अब जैविक पेस्टीसाइट, जैविक खाद आदि के बारे में भी बताया जाएगा। किसानों को इस साल हरी खाद और केंचुए से तैयार खाद का लाभ ही बताया गया था। बाकी जैविक उर्वरकों से भी जोड़ा जाएगा।
यह है रासायनिक खेती का खर्च
एक बीघा जमीन में किसान दस किग्रा डाया, 25 किलो यूरिया डालते हैं। इसके अलावा पेस्टीसाइट का छिड़काव भी करते हैं। इसमे प्रति बीघा 500 रुपये तक की लागत आती है। जैविक खेती में रासायनिक खाद बिलकुल नहीं डाली जाती।
जैविक गन्ने से बने गुड़ के मिल रहे अच्छे दाम
गांव सबलगढ़ में जैविक खेती कर रहे इरफान अंसारी का कहना है कि जैविक गन्ने से बने गुड़ से अच्छे दाम मिल रहे हैं। नगद भुगतान मिल रहा है और चीनी मिल पर निर्भरता कम हुई है। इस साल फसल हलकी रही। अगले साल और मेहनत करेंगे।
जैविक खेती में लागत कम, प्राकृतिक संसाधनों से ही हो जाती है खेती
रासायनिक खेती के दौर में जिले के किसान जैविक खेती भी अपना रहे हैं। नजीबाबाद के गांव वीरूवाला के रहने वाले किसान सुरजीत सिंह चीमा दो साल से जैविक खेती कर रहे हैं। वे गन्ने से लेकर पशुओं के चारे तक सभी फसल जैविक बोते हैं। उनसे प्रभावित होकर गांव के कई और किसान भी जैविक खेती अपना चुके हैं। सुरजीत सिंह चीमा का कहना है कि जैविक खेती में लागत बहुत कम है। सारी खेती केवल प्राकृतिक संसाधनों से ही पूरी हो जाती है।
गांव मुकीमपुर धर्मसी के विनोद कुमार कई साल से गन्ने और हल्दी की जैविक खेती कर रहे हैं। वे गन्ने को मिल में नहीं बेचते हैं बल्कि उसका रस निकालकर शीरा बनाकर बेचते हैं। विनोद कुमार एक क्विंटल गन्ने से 50 लीटर शीरा निकालते हैं। शीरा 50 रुपये लीटर तक आराम से बिक जाता है। जैविक शीरे की बहुत डिमांड है। वे एक क्विंटल गन्ने से ढाई हजार रुपये तक कमा रहे हैं। इसके अलावा हल्दी भी वे दिल्ली जाकर बेच रहे हैं। हल्दी 500 रुपये प्रति किग्रा तक बिक रही है। जैविक खेती की वजह से ही वे मोटी आमदनी कमा रहे हैं।
जीरो बजट खेती है फायदेमंद
अफजलगढ़ स्थित रामगंगा कृषिफार्म के प्रबंधक करुण अग्रवाल कई साल से जैविक खेती कर रहे हैं। उनका कहना है कि रासायनिक खादों से खेती का क्षणिक लाभ तो है लेकिन इस के प्रयोग से जमीन उर्वरक क्षमता क्षीण हो जाने के कारण धीरे धीरे धीरे भूमि बंजर होने की संभावना बढ़ जाती है। उन्होंने बताया कि वह शत-प्रतिशत जैविक खेती पर जोर दे रहे है।
गांव प्रेमपुरी निवासी सरदार अमरीक सिंह ने बताया कि बीते कुछ साल से अचानक उनका रुझान जैविक खेती की ओर बढ़ने लगा इसके बाद उसने मुख्य फसल गन्ना धान व गेहूँ खासकर काला गेहूं तथा सहफसली के रूप में इनके साथ अदरक, हल्दी, प्याज, लहसुन, गोभी आलू की जैविक खेती शुरू कर दी।
बाजार उपलब्ध कराने की कोशिश
जिला कृषि अधिकारी डा.अवधेश मिश्र के अनुसार जैविक खेती से जुड़ने वाले किसानों को बाजार उपलब्ध कराया गया है। बाकी गांवों के किसानों की फसल बिकवाने के लिए भी योजना है। दूसरी कंपनी को भी किसानों के बीच लाया जाएगा। किसानों के जैविक उत्पाद जिला, तहसील व ब्लॉक स्तर पर भी बेचने की योजना है।