मेरठ की फिज़ाओं में आज भी उनकी आवाज़ तैरती हुई महसूस होती है। बतौर उर्दू प्रोफेसर मेरठ महज उनका कार्यस्थल नहीं था, बल्कि उनकी शायरी की रूह में बसा हुआ शहर था। यहां की तहज़ीब, यहां के लोग, यहां की अदबी महफ़िलें और मुशायरे उनकी सोच और एहसास का हिस्सा बन गए थे।
उस दौर में मेरठ उर्दू अदब का एक बड़ा मरकज़ हुआ करता था। इस इदारे में शमीम जयपुरी, हफीज मेरठी, हफीज रुड़कवी, सलीम खतौलवी, अनवर मेरठी, नाज़िम अंबेहटवी, अलम मुज़फ्फरनगरी सरीखे उस्ताद शायरों के बीच बशीर बद्र ने अपनी अलग राह बनाई। उन्होंने शायरी की पुरानी रिवायतों से हटकर गज़ल को नया रंग और नया लहजा दिया।
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उनकी शायरी में जिंदगी के दर्दनाक मसाइल भी ऐसे आते हैं जैसे पैरों में घुंघरू बांधकर रक्स कर रहे हों। दर्द वहां रोता नहीं, मुस्कुराता है। तन्हाई वहां टूटती नहीं, गुनगुनाती है। यही वजह थी कि उनकी गज़लें सीधे दिल में उतर जाती थीं।
बशीर बद्र ने उर्दू शायरी को भारी-भरकम अल्फ़ाज़ से बाहर निकालकर आम इंसान की जिंदगी से जोड़ दिया। उन्होंने मोहब्बत, रिश्तों, अकेलेपन और बदलते वक्त को इतनी सादगी से बयान किया कि हर आदमी को अपनी कहानी उनमें दिखाई देने लगी।
उनके अनगिनत शेर आज भी लोगों की जुबान पर हैं। इन अशआर में सिर्फ़ अल्फ़ाज़ नहीं, बल्कि पूरे दौर की तन्हाई और इंसानी रिश्तों की कसक छिपी हुई है।
हर शहर बोलता है हमारे बशीर साहब
बशीर बद्र का अंदाज़ इतना नायाब था कि अलीगढ़, मेरठ, कानपुर, अयोध्या और भोपाल जैसे शहर भी उन्हें अपना शायर कहने में फ़ख्र महसूस करते हैं। उन्होंने अदब की बनी-बनाई खाइयों से निकलकर अपनी शायरी का ऐसा कुतुबमीनार खड़ा किया, जहां से उनकी आवाज़ दूर-दूर तक सुनाई दी-
'चांद कहते हैं किसे खूब समझते होंगे,
वो गज़ल वालों का उस्लूब समझते होंगे।
इतनी मिलती है मेरी गज़लों से तेरी सूरत,
लोग तुझको मेरा महबूब समझते होंगे।'
इन शेरों ने उर्दू अदब के आसमान पर एक नई कहकशां पैदा की। उनकी शायरी में सुलगते जंगल में फूलों की खुशबू का एहसास मिलता है। वे दर्द लिखते थे, मगर मायूसी नहीं फैलाते थे। उनकी गज़लों में उम्मीद हमेशा जिंदा रहती थी। शायद यही वजह है कि वे अपने दौर में वही काम कर गए जो कभी ग़ालिब ने किया था। उन्होंने गज़ल को नई ज़बान, नया अहसास और नया आसमान दिया।
आज बशीर बद्र हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी शायरी हमेशा जिंदा रहेगी। जब भी मोहब्बत, तन्हाई, रिश्तों या यादों की बात होगी, उनके अशआर हवा में धीरे से सरसराते हुए सुनाई देंगे-
'कभी मैं अपने हाथों की लकीरों से नहीं उलझा,
मुझे मालूम है किस्मत का लिखा भी बदलता है।'
यही उम्मीद, यही नरमी और यही इंसानियत बशीर बद्र की असली पहचान है और रहेगी।