फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अनोखी खुशबू, उम्दा मिठास.., निराला था देसी 'बट्टी' का स्वाद, गायब हुई बागपत के खरबूजे की खास प्रजाति

Mon, 13 May 2019 02:04 PM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बागपत
विज्ञापन
1 of 10
बागपत का मशहूर खरबूजा - फोटो : अमर उजाला
यमुना किनारे बसे बागपत को यहां के खरबूजे ने खास पहचान बख्शी थी। बागपत के खरबूजे को कई राज्यों में सप्लाई किया जाता था, लोग चाव से खाते थे, लेकिन बदलते दौर में बागपत को पहचान देने वाला खरबूजा खेतों और बाजार से गायब हो गया। 
विज्ञापन

2 of 10
खरबूजे के खेत में पानी लगाती महिलाएं - फोटो : अमर उजाला
यमुना में आए साल पानी की कमी के कारण किसानों ने भी गंगा किनारे के क्षेत्र का रुख करना शुरू कर दिया है। बागपत के पालेज लगाने वाले किसान मुजफ्फरनगर से लेकर गढ़ मुक्तेश्वर तक खरबूजे की पालेज लगा रहे हैं, लेकिन यहां अब बागपत के खरबूजे की देसी वैरायटी की जगह हाइब्रिड बीजों ने ले ली है। 

 
विज्ञापन

3 of 10
खरबूजा विक्रेता - फोटो : अमर उजाला
नए दौर में मधु राजा नाम की वैरायटी की बाजार में खूब मांग है। किसान बताते हैं कि बागपत के देसी खरबूजे के बाद मधु राजा की मांग सबसे अधिक हुई है। इसकी मिठास के चलते दिल्ली से एडवांस बुकिंग चल रही है। बागपत के देसी खरबूजे की किस्म पानी की कमी और फसल में बीमारी की अधिकता के चलते करीब एक दशक पहले ही दम तोड़ चुकी है। अब यहां मधु राजा की धूम है। 

 

4 of 10
खरबूजा
गढ़मुक्तेश्वर की ओर किसानों ने किया रुख
यमुना में पानी की कमी के चलते किसानों ने अब गंगा क्षेत्र की ओर रुख किया हुआ है। अहमद, जम्मे, यामीन, अरबू, रूम्मी, काला सहित दर्जनों क्षेत्रीय किसान गढ़मुक्तेश्वर में हर वर्ष जाते हैं। वहां जमीन उगाही पर लेकर खरबूजे और तरबूज की पैदावार करते हैं। कारण गंगा में हर समय पानी रहता है। इसके चलते लोग वहीं पालेज लगाकर अपना और परिवार का गुजर बस कर रहे हैं। 
विज्ञापन

5 of 10
खरबूजे का फल दिखाती महिला
हाईब्रिड के फेर में फंस गए किसान
किसान नूर हसन, यूसुफ, बिट्टू, नूरद्दीन बताते है कि यमुना में पानी न आना फसलों को नुकसान होता है। यही वजह है कि बागपत का खरबूजे ने अपनी पहचान को खो दिया है। वहीं हाईब्रीड बीज का भी चलन बढ़ा है, जिस कारण किसान पुरानी प्रजाति को भूल गए है। हाईब्रिड से किसानों को कम समय में बेहतर फसल मिल रही है।
विज्ञापन

6 of 10
किसान सुंदर सिंह - फोटो : अमर उजाला
निराला था देसी बट्टी का स्वाद
किसान जाकिर हुसैन ने बताया कि बागपत के खरबूजे को देसी बट्टी के नाम से भी जाना जाता था। जब भी खरबूजा कटता था तो उसमें से खुशबू आती थी। इससे पता चल जाता था कि यह बागपत का खरबूजा है। 
विज्ञापन

7 of 10
किसान ओमबीर कश्यप - फोटो : अमर उजाला
अब आई मधु राजा नाम की वैरायटी 
किसान सुंदर सिंह और ओमबीर कश्यप, रतन, रामपाल, बाबूराम सहित अन्य  ने बताया कि अब बागपत की प्रजाति के बाद मधु राजा नाम की वैरायटी आई है। मिठास के कारण इसकी मांग बढ़ी रही है। 

8 of 10
जय लाल सिंह - फोटो : अमर उजाला
अब नहीं मिलती पहले जैसी मिठास-पानी की कमी बड़ा कारण
जय लाल सिंह कहते हैं कि बागपत के खरबूजे की वैरायटी खत्म होने की वजह है पानी की कमी। यदि यमुना में नियमित पानी आता रहे तो किसानों को परेशानी का सामना न करना पड़े। मजबूरन किसान ऐसी वैरायटी ला रहे हैं, जो कम पानी और कम समय में फसल देती हो। 

9 of 10
चौधरी लख्मी चंद - फोटो : अमर उजाला
मीठे से चिपकते थे होंठ 
चौधरी लख्मी चंद कहते हैं कि बागपत के खरबूजे के कटते ही उसकी खुशबू फैल जाती थी। मीठा इतना था कि होंठ चिपक जाते थे। अब तो मिठास और स्वाद नहीं मिलता।
 
विज्ञापन

10 of 10
राजबल सिंह त्यागी - फोटो : अमर उजाला
50 पैसे में खाया था वो खरबूजा, अब 50 रुपये में भी वैसे बात नहीं
राजबल सिंह त्यागी ने कहा कि कहीं भी अगर खरबूजा दिखाई देता था तो उसे खाने को मन करता था। बागपत का खरबूजा तो उन्होंने 50 पैसे में भी खाया है, लेकिन अब तो 50 रुपये में भी वो स्वाद और मिठास नहीं मिल रही है। 
नोट- इन खबरों के बारे अपकी क्या राय है। हमें फेसबुक पर कमेंट बॉक्स में लिखकर बताएं।

शहर से लेकर देश तक की ताजा खबरें व वीडियो देखने लिए हमारे इस फेसबुक पेज को लाइक करें


https://www.facebook.com/AuNewsMeerut/
 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें