शहर के खराब ड्रैनेज सिस्टम ने लाखों की सड़कें तोड़ दी हैं। सरकारी खजाने से सालाना 30 से 40 करोड़ रुपये सिर्फ इसके लिए ही खर्च किए जा रहे हैं, फिर भी जलभराव की समस्या बरकरार है। नालों की सफाई नहीं हो रही है। आमतौर पर यही देखने में आया है कि नाले बनने के दो माह के भीतर ही सड़कों पर पानी बहना शुरू हो जाता है। इन हालात में शहर की अधिकांश सड़कें खराब ड्रैनेज सिस्टम की भेंट चढ़ गई हैं।
घंटाघर से लेकर रेलवे रोड चौराहे तक की सड़क भी खराब ड्रैनेज सिस्टम की भेंट चढ़ गई है। लगातार चार दिन सीवर उफने रहे और पानी सड़क पर भरा रहा। चार दिन में लाखों रुपये की लागत से बनी सड़क टूट गई है। अब गड्ढों में तब्दील हो गई इस व्यस्ततम सड़क पर चलना भी दूभर हो रहा है। इन हालात में प्रतिदिन गड्ढों में फंसकर रिक्शे पलट रहे हैं, जिससे लोग घायल हो रहे हैं।
नगर निगम, जल निगम बना चुका कई बार
घंटाघर से रेलवे रोड चौराहे तक की सड़क को नगर निगम से पहले जल निगम भी बना चुका है। सड़क बनती है और टूट जाती है। इसकी वजह घटिया निर्माण सामग्री और आए दिन होने वाले जलभराव को ही माना जा रहा है।
60 लाख में फिर से बनाने की तैयारी
नगर निगम से मिली जानकारी के मुताबिक घंटाघर से रेलवे रोड चौराहे तक मार्ग का निर्माण एमडीए कराने वाला है। वह भी 60 लाख से अधिक खर्च करके। सड़क बनाने और साथ-साथ नाले के किनारे पोल और जंजीर लगाकर बैरिकेडिंग कराने का प्लान है। ताकि मार्ग को अतिक्रमण से मुक्त रखा जा सके। एमडीए के इस बजट से ही अंदाज लगाया जा सकता है कि एक किलोमीटर से भी कम मार्ग पर सालाना 50-60 लाख रुपये सड़क बनाने पर खर्च हो रहे हैं।
तारकोल की सड़क का दुश्मन पानी
चीफ इंजीनियर कुलभूषण वार्ष्णेय का कहना है कि तारकोल से बनी सड़क के लिए पानी दुश्मन है। अगर सड़क पर पानी न भरे यानी रुके नहीं तो वह दस साल भी नहीं टूटने वाली। सड़क बनवाते समय गुणवत्ता का भी पूरा ध्यान रखा जाता है। नालों का पानी भरते ही सड़क टूटनी शुरू हो जाती है। अगर समय से नाले और नालियों की सफाई होती रहे तो सड़क बनाने पर खर्च होने वाली कम से कम 30-40 प्रतिशत धनराशि में कमी आएगी।