बागपत में शहजाद राय शोध संस्थान की पहल पर केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने बरनावा में उत्खनन की मंजूरी दे दी है। खुदाई हुई तो सदियों से रहस्य बने मिट्टी के टीले से महाभारतकालीन कई हकीकत आमजन के सामने स्पष्ट होगी। भले ही बरनावा को पर्यटन सर्किट में शामिल किया हो, लेकिन इसकी देख-रेख में अदूरदर्शिता ही बरती गई है।
केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के अधीन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग उत्खनन शाखा द्वितीय और भारतीय पुरातत्व संस्थान लाल किला की संयुक्त टीम बरनावा के लाक्षागृह टीले की विधिवत विस्तृत उत्खनन की मंजूरी दे दी है। शहजाद राय शोध संस्थान के निदेशक अमित राय जैन ने इसकी पुष्टि की। अमर उजाला ने 23 अक्तूबर के अंक में इस आशय का समाचार प्रकाशित किया था। बरनावा का टीला असल में सदियों से लोगों के लिए उत्सुकता है। सवाल सैंकड़ों है। महाभारतकालीन इस टीले को लाक्षागृह बताते हैं। पुरातत्व विभाग ने इसे संरक्षित किया है। सदियों बाद भी सिर्फ सरकारी उदासीनता की वजह से रहस्य बना हुआ है। पांडव यहां ठहरे, यहीं पर उन्हें लाक्षागृह में जलाने का प्रयास किया गया। बरनावा का पूरा क्षेत्र ही नहीं बल्कि मुजफ्फरनगर, शामली में भी महाभारत काल के अवशेष हैं। इसकी पुष्टि इस वजह से भी होती है, क्योंकि यह पूरा एरिया कुरुक्षेत्र और हस्तिनापुर के बीच पड़ता है। खुदाई की मंजूरी से महाभारत कालीन हकीकत सामने आने की उम्मीद बन गई है।
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दूसरी बार खोदाई, खुल चुके कई राज
वर्ष 2005 में शहजाद राय शोध संस्थान के इतिहासकारों के प्रयासों से सिनौली और वर्ष 2015 में चंदायन गांव में उत्खनन का कार्य केंद्र सरकार करा चुकी है। बरनावा गांव की जमीन में दफन गुत्थियों को भी अब बाहर निकाला जाएगा। बरनावा टीला पहले ही संरक्षित गुफा की लिस्ट में शामिल है। बरनावा टीले पर करीब 22 बार शोध संस्थान के शोधार्थियों और इतिहासकारों की टीम सर्वेक्षण पूर्व में कर चुकी है। यहां से चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति, कुषाण, गुप्त और राजपूत सभ्यताओं के प्रमाण पहले से प्राप्त होते रहे हैं।
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