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अधिकारों के साथ कर्तव्यों का चिंतन भी आवश्यक : जतन स्वरूप

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आर एस एस की गोष्ठी में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए वक्ता जतन स्वरुप। (मवाना)
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- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष पर गोष्ठी का आयोजन
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संवाद न्यूज एजेंसी
मवाना। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर जतन स्वरूप ने उद्बोधन में कहा कि भारत माता को पुनः विश्व गुरु के स्थान पर स्थापित करने के लिए समाज के प्रत्येक व्यक्ति के भीतर राष्ट्रभक्ति की भावना का होना अत्यंत आवश्यक है। कार्यक्रम प्रबुद्ध एवं प्रमुख जनों की उपस्थिति में उत्सव मंडप में गोष्ठी का आयोजन हुआ। इसमें मुख्य वक्ता जतन स्वरूप एवं विनीत कौशल उपस्थित रहे।
जतन स्वरूप ने कहा कि हमारा संविधान जहां हमें मौलिक अधिकार प्रदान करता है, वहीं हमें अपने मौलिक कर्तव्यों के प्रति भी सजग रहना चाहिए। अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों का चिंतन भी समान रूप से आवश्यक है। उन्होंने विभिन्न विचारधाराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि एक समय कम्युनिस्ट विचारधारा में चाहे जो मजबूरी हो, हमारी मांगें पूरी हों जैसे नारे प्रचलित थे, वहीं संघ ने राष्ट्रभक्त समाज के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करते हुए लोगों को देशहित में कार्य करने के लिए प्रेरित किया।
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उन्होंने कहा कि पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को कई बार क्षमा किया, किंतु अंततः उन्हें इसका प्रतिकूल परिणाम भुगतना पड़ा। इससे सीख लेते हुए उन्होंने कहा कि उदारता के साथ-साथ सजगता और दृढ़ता भी आवश्यक है। महाभारत का उदाहरण देते हुए कर्ण और अर्जुन के प्रसंग का उल्लेख किया और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। कहा कि वर्तमान समय में भारत भी चाणक्य नीति के सिद्धांतों का अनुसरण कर रहा है। उन्होंने एमएस गोलवलकर के विचार हिन्दवः सर्वे सहोदराः न हिंदू पतितों भवेत का उल्लेख करते हुए समाज में समानता और एकता का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि मां ही बालक की प्रथम गुरु होती है, इसलिए संस्कारों की शुरुआत परिवार से ही होती है।
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विभाग प्रचारक विनीत कौशल ने कहा कि अच्छे कार्यों के लिए अच्छे व्यक्तियों का निर्माण आवश्यक है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ विगत 100 वर्षों से शाखाओं के माध्यम से ऐसे व्यक्तित्वों का निर्माण कर रहा है। कार्यक्रम में सह विभाग प्रचारक नमन, सह जिला कार्यवाह अंकुश, अंशु, श्यामलाल, रणवीर, यशपाल, प्रताप, ब्रह्मचारी, सौरभ आदि उपस्थित रहे।

आर एस एस की गोष्ठी में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए वक्ता जतन स्वरुप। (मवाना)

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