भारतीय किसान यूनियन की 'किसान क्रांति पदयात्रा' के भविष्य में जो भी परिणाम निकलें, पर रालोद सुप्रीमो चौधरी अजित सिंह इस आंदोलन में अपने को मजबूत करने में कामयाब हो गये हैं। आंदोलन के अंतिम पड़ाव में उन्होंने किसानों के करीब पहुंचकर उनकी नजदीकी हासिल करने का तीर चलाया। आंदोलन गैर सियासी संगठन भाकियू का था, लेकिन सियासी फायदे की उम्मीद अजित सिंह के लिए मजबूत हुई हैं। उन्होंने किसानों में केंद्र सरकार और भाजपा के प्रति गुस्से को भुनाने के लिए दिल्ली बॉर्डर पर मिले अवसर को लपक लिया।
मंगलवार को भाकियू की पदयात्रा को दिल्ली बॉर्डर पर रोकने से वेस्ट यूपी से लेकर दिल्ली तक राजनीतिक तापमान बढ़ता चला गया। यूपी, केंद्र सरकार के मंत्री और भाजपा के सिपहसालार पूरे घटनाक्रम को बातचीत और आश्वासनों से निपटाने में लगे थे, लेकिन इसमें अनावश्यक देरी ने किसानों के गुस्से को बढ़ाने का काम किया। सरकारों के वार्ताकार और भाजपा के सिपहसालार जब संभले, तब तक देर हो चुकी थी। जो काम यूपी में हो सकता था, उसमें चूक गए। सरकार और संगठन में शामिल वेस्ट यूपी के दिग्गज भी आंकलन करने में मात खा गए। जब देर का अहसास हुआ तो डोर भी हाथ से छूट गई। किसान रणनीति के रूप में मजबूत निकलें। यूपी बॉर्डर पर यूपी के गन्ना राज्यमंत्री सुरेश राणा से लेकर अन्य केंद्रीय मंत्रियों ने किसानों को मनाने की कवायद शुरू की। बात नहीं बनी तो लाठीचार्ज, पानी की बौछार और रबड़ बुलेट का इस्तेमाल हुआ।
चौ. अजित सिंह के लिए यही अवसर सियासी सहानुभूति हासिल करने वाला रहा। लंबे समय से किसानों की राजनीति करने वाले छोटे चौधरी ने जरा भी चूक नहीं की और सही समय पर किसानों के बीच पहुंच गए। किसान आक्रोशित थे और भाजपाई मंत्रियों पर जूते चप्पल उछाल चुके थे। ऐसे में अजित सिंह की उपस्थिति से किसानों में जोश भर गया। किसानों ने उन्हें कांधों पर उठाया तो अजित भी नहीं चूके और किसान के मुद्दों पर केंद्र सरकार और भाजपा पर तमाम आरोप लगाए और निशाने साधे। डिहाइड्रेशन के कारण अचेत तक हो गए और किसानों में अपने प्रति सियासी सहानुभूति की संभावनाओं को मजबूत कर गए।