मेरठ। फजीहत होने के बाद भी पुलिस बेफिक्र है। तथाकथित वीआईपी की कलई खुलने के बाद भी भाजपा नेता को ढाल बना लिया। लेकिन अपनी तरफ से रिपोर्ट दर्ज कराने की जहमत तक नहीं उठाई। आरोपी को फरार होने का भी पूरा मौका दिया।
पुलिस की भूमिका इस मामले में पहले से ही गैर जिम्मेदार रही। पहले बिना जांच पड़ताल कराए एस्कार्ट दे दी और फिर शिकायत, हंगामा होते ही तुरंत वापस भी ले ली। जिस तथाकथित मंत्रालय से यह फैक्स आया, उसमें कहीं भी किसी विभागीय अफसर का बेसिक या मोबाइल नंबर नहीं है। जिससे पूछा जा सके कि किस प्रोटोकाल में एस्कार्ट दी जाएगी।
मजे की बात यह है कि तथाकथित मंत्री ताजीम अब्बास ने फैक्स कराने के बाद एसपी ट्रैफिक से इस संबंध में पूछा भी। लेकिन उसके बावजूद यह भी जानने की कोशिश नहीं की गई कि ताजीम अब्बास ऐसे कौन से माननीय हैं जो रात को खुद फोन कर एस्कार्ट के बारे में पूछ रहे हैं। न ही इस संबंध में थाना फलावदा से जाना गया कि कस्बा फलावदा में रहने वाले ताजीम अब्बास कौन से कोटे से राज्य मंत्री हैं। जबकि फैक्स हुए आदेश पत्र में उनका मूल निवास फलावदा दर्ज था। इस प्रकरण को लेकर यह भी गंभीर सवाल उठते हैं कि बिना जांच पड़ताल के पुलिस ने कैसे एस्कार्ट उपलब्ध करा दी। ऐसे तो कोई भी किसी भी मंत्रालय से फैक्स कराकर एस्कार्ट की सुविधा प्राप्त कर ले और पुलिस सुरक्षा की आड़ लेकर कोई आतंकी वारदात ही न कर बैठे। जबकि त्योहारी सीजन में अतिसंवेदनशील जिले में पहले से ही हाई अलर्ट घोषित है।
यह पहला मौका नहीं
इस तरह एस्कार्ट लेने का यह पहला मौका नहीं है। इससे पहले भी खुद को खाद्य मंत्रालय का दर्जा प्राप्त मंत्री बताकर एक तथाकथित नेता ने एस्कार्ट और सरकारी सुरक्षा ली थी। यही नहीं मेरठ के देहात क्षेत्र में घूमने के बाद मुजफ्फरनगर में सरकारी अफसरों से बैठक तक कर डाली थी। उस समय हंगामा हुआ तो जांच कराने की बात कहकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था।
तर्क तो अच्छा है
जिले में ऐसा कोई दिन नहीं जाता, जब कोई वीआईपी न आता हो। करीब-करीब सभी प्रमुख व्यक्ति या माननीय तो पहचान में रहते हैं। लेकिन किसी विशेष मामले में तत्काल प्रभाव से जांच कराना संभव नहीं होता। ऐसे में जब किसी को जान का खतरा होने की बात कही जाए। हालांकि इस प्रकरण की गहनता से जांच कराई जा रही है। पीके तिवारी, एसपी ट्रैफिक/प्रोटोकाल अधिकारी