प्राचीन ऐतिहासिक नगरी हस्तिनापुर में वर्षीतप पारणा महोत्सव की तैयारियां चल रही हैं। 18 अप्रैल को अक्षय तृतीया है। इसका इतिहास हस्तिनापुर तीर्थ से ही प्रारंभ हुआ है।
वैशाख सुदी तीज को अक्षय तृतीय के नाम से जाना जाता है। अक्षय का अर्थ है जिस वस्तु का कभी क्षय न हो अर्थात वस्तु समाप्त न हो और वह महीना वैशाख का था और तिथि तृतीया थी। इसलिए इसका नाम अक्षय तृतीया पड़ा। लोगों का मानना है कि इस दिवस किया जाने वाला कार्य वृद्धि को प्राप्त होता है। भगवान ऋषभदेव को हुए कोड़ा कोड़ी वर्ष व्यतीत हो गए। इसके बावजूद आज भी अक्षय तृतीया का पर्व मनाने के लिए देश एवं विदेश से जैन श्रद्धालु हस्तिनापुर की धरती पर आते हैं। जैन श्रद्धालु आहार दान की महिमा का वर्णन करते हुए इस पवित्र धरती पर आते हैं। इस पवित्र दिवस का ये महत्व है कि बिना मुर्हूत के ही हजारों विवाह संपन्न होते हैं। अगणित गृह प्रवेश आदि मांगलिक कार्य संपन्न किए जाते हैं और इसे सर्वश्रेष्ठ मुर्हूत माना जाता है।
भगवान ऋषभदेव ने अयोध्या में जन्म लिया एवं प्रयाग की (इलाहाबाद) धरती पर जैनेश्वरी दीक्षा को धारण किया। दीक्षा को धारण करते ही ध्यान लगाकर भगवान बैठ गए। भगवान के साथ में चार हजार राजाओं ने दीक्षा ग्रहण की। हस्तिनापुर नगरी के शासक राजा सोमप्रभ और उनके भाई श्रेयांस कुमार थे। तभी बीती रात्रि में राजा श्रेयांस को उत्तम-उत्तम सात स्वप्न दिखाई देते हैं। प्रात: वह अपने स्वप्नों को अपने भाई सोमप्रभ से उन स्वप्नों को बताकर उनका फल पूछते हैं। राजा श्रेयांस प्रभु को आहार देने में मग्न हैं। देवतागण हर्ष विभोर होकर के पंचाश्चर्य की वृष्टि कर रहे हैं। प्रभु ऋभषदेव आहार करके वन की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। उस दिन सारे नगर में गन्ने के सार का प्रसाद वितरण किया जाता है। फिर भी गन्ने का रस समाप्त नहीं होता है। वह अक्षय हो जाता है।
कैसे मनाते हैं अक्षय तृतीया पर्व
इस दिन को आगम के अनुसार बहुत पवित्र दिवस मानते हैं। इस दिन समीपवर्ती ग्राम में या अपने नगर में जो भी साधु मौजूद होते हैं। उन साधुओं को इक्षुरस (गन्ने का रस) का आहार कराते हैं। चूकि भगवान ऋषभदेव ने 1 वर्ष 39 दिन के पश्चात इक्षुरस का आहार राजा श्रेयांस से हस्तिनापुर नगरी के अंदर प्राप्त किया था। इसलिए यह दिन अमर हो गया। आज भी वर्षीय तप करने वाले महानुभाव देश-विदेश से हस्तिनापुर की धरती पर पारणा (उपवास खोलने के लिए) करने के लिए हस्तिनापुर नगरी में आते हैं। हस्तिनापुर जम्बूद्वीप स्थल पर जैन समाज की सर्वोच्च साध्वी गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की पावन प्रेरणा से आहार महल का निर्माण किया हैै। जिसमें भगवान ऋषभदेव एवं राजा श्रेयांस की प्रतिमा विराजमान की गई है। प्रत्येक वर्ष इस प्रतिमा के समक्ष इक्षुरस का आहार कराया जाता है। वहीं, आने वाले श्रद्धालु भगवान को आहार देने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं एवं गन्ने के रस का प्रसाद ग्रहण करते हैं। अक्षय तृतीया का पावन पर्व हस्तिनापुर से ही प्रारंभ हुआ है। इसकी पहचान ही हस्तिनापुर से है।
मुख्य बातें
वर्षीतप पारणा महोत्सव की तैयारी जोरों पर
देश, विदेश से बड़ी संख्या में पहुंचेंगे श्रद्धालु
वर्षीतप पारणा महोत्सव 14 से
हस्तिनापुर। श्री श्वेतांबर जैन मंदिर में वर्षीतप पारणा महोत्सव 14 अप्रैल से 19 अप्रैल 2018 तक मनाया जाएगा। इस महोत्सव में श्री आदीश्वर भगवान के पारणा के मूल स्थल चरण मंदिर पर चतुर्विध संघ तपस्वियों के साथ 18 अप्रैल को वर घोड़ा यात्रा पारण के मूल स्थल पर श्री आदीश्वर भगवान एवं चरणों का इक्षुरस से भक्तजन प्रक्षाल करेंगे। पारणे के मूल स्थल पर सभी तपस्वियों का बहुमान व श्री शांतिनाथ भगवान के मंदिर में प्रक्षाल पूजन, पारणा एवं कल्याणक मंदिर में श्री आदीश्वर भगवान को इक्षुरस से वोहराना लाभ आदि मुख्य कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।