एक ओर आम जनता सड़कों पर बसों की कमी के कारण परेशान हैं वहीं दूसरी ओर मेरठ परिक्षेत्र के डिपो में अधिकारियों की कथित लापरवाही के चलते रोडवेज की 100 से अधिक बसें धूल फांक रही हैं। इन खड़ी बसों के कारण उत्तर प्रदेश परिवहन निगम को प्रतिमाह लगभग 23 लाख रुपये से अधिक का टैक्स भरना पड़ रहा है।
मेरठ परिक्षेत्र के अंतर्गत मेरठ डिपो, भैंसाली डिपो, सोहराबगेट, गढ़मुक्तेश्वर, मवाना, बागपत और बड़ौत डिपो आते हैं। आंकड़ों के मुताबिक क्षेत्र में कुल 691 रोडवेज बसें हैं। इनमें से करीब 100 बसें ऐसी हैं जिन्हें रूट पर भेजने के बजाय डिपो में ही खड़ा कर दिया गया है। अमर उजाला की पड़ताल में सामने आया कि सोहराबगेट डिपो में ऐसी बसों की संख्या सबसे अधिक है। बसों के पहिये थमने का मुख्य कारण चालक और परिचालकों (स्टाफ) की भारी कमी बताया जा रहा है।
बिना चले ही खाली हो रहा खजाना
परिवहन निगम के नियमों के अनुसार बसों पर टैक्स यात्री सीट के आधार पर देय होता है। नई बस पर एक सीट पर प्रतिमाह लगभग 600 रुपये टैक्स लगता है। इस हिसाब से 52 सीट वाली नई बस का मासिक टैक्स 31,200 रुपये बैठता है। 5 साल या उससे अधिक पुरानी बस होने पर यह टैक्स घटकर 400 से 450 रुपये प्रति सीट हो जाता है। विभागीय सूत्रों के अनुसार यदि मेरठ की इन 100 खड़ी बसों को 5 साल पुरानी (न्यूनतम टैक्स स्लैब) भी मान लिया जाए तो भी प्रतिमाह 23 लाख रुपये से अधिक का कर भुगतान करना पड़ रहा है। गणना के आधार पर पिछले 6 माह में निगम को लगभग 1.40 करोड़ रुपये का टैक्स बिना किसी आय के भरना पड़ा है।
अफसर बोल रहे- स्टाफ की कमी
डिपो में खड़ी इन बसों में कई बिल्कुल नई बसें भी हैं। आरोप लग रहे हैं कि निजी अनुबंधित बसों को फायदा पहुंचाने के लिए निगम की अपनी बसों के संचालन में जानबूझकर ढिलाई बरती जा रही है। हालांकि अधिकारी इसका दोष स्टाफ की कमी पर मढ़ रहे हैं। वर्तमान में इस कमी को पूरा करने के लिए महिला परिचालकों की भर्ती प्रक्रिया पाइपलाइन में बताई जा रही है।
केवल मेरठ ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश में चालक और परिचालकों की कमी के कारण बसें डिपो में खड़ी हैं। मेरठ क्षेत्र में भी करीब 100 बसें स्टाफ न होने से रुकी हैं जिनमें कुछ पुरानी बसें भी हैं। यह सही है कि खड़ी बसों का टैक्स तो देना ही पड़ता है। समस्या के समाधान के लिए महिला परिचालकों की भर्ती की जा रही है। -संदीप कुमार नायक, क्षेत्रीय प्रबंधक, मेरठ)