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1969 के विधान सभा चुनाव में उखड़ गई कम्युनिस्ट पार्टी की मजबूत जड़ें

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मुहम्मदाबाद गोहना। देश की आजादी के बाद उत्तर प्रदेश में पहली बार 1969 में मध्यवर्ती चुनाव की नौबत आई। कांग्रेस पार्टी से अलग होकर चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में गैर कांग्रेसी विपक्ष ने कांग्रेस के समक्ष मजबूत चुनौती पेश किया। पांचवीं विधान सभा के लिए पांच फरवरी 1969 को चुनाव हुआ।
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तत्कालीन आजमगढ़ जनपद लेकिन वर्तमान में मऊ जनपद की सभी चार विधानसभाओं में कम्युनिस्ट पार्टी का वर्चस्व था। आजादी के बाद1952 के पहले विधानसभा चुनाव से ही अपने जीत का परचम फहरा रही कम्युनिस्ट पार्टी के लिए 1969 का चुनाव मऊ जनपद में वाटर लू साबित हुआ। इस चुनाव में तत्कालीन आजमगढ़ लेकिन वर्तमान में मऊ जनपद की चारों विधानसभा में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रत्याशियों की करारी हार हुई। सभी सीटें कांग्रेस और विपक्षी दल ने जीत कर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का वर्चस्व तोड़ दिया। इस चुनाव में एक और विशेष बात हुई तत्कालीन नत्थूपुर विधानसभा को अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित किया गया। यहां से लगातार जीत दर्ज कर रहे रामसुंदर पहली बार चुनाव लड़ने से वंचित रह गए। उस चुनाव में मुहम्मदाबाद गोहना सुरक्षित विधानसभा क्षेत्र से सोशलिस्ट पार्टी के श्यामलाल ने 13164 मत पाकर भारतीय जनसंघ के प्रत्याशी दीपा राम को पराजित किया। इसी प्रकार मऊ जनपद में बीकेडी के हबीबुर्रहमान ने 15810 मत पाकर कम्युनिस्ट पार्टी के एमके बाकी को पराजित किया।
घोसी विधानसभा क्षेत्र में प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामविलास पांडे ने अपनी जीत का परचम फहराया और वहां से 20994 मत पाकर कम्युनिस्ट पार्टी के जफर आजमी को पराजित किया। इसी तरह नत्थूपुर विधान सभा भी कम्युनिस्ट पार्टी के लिए मुफीद नहीं साबित हुई। यहां कांग्रेस के लालसा राम ने 20273 मत पाकर सोसलिस्ट पार्टी के हरदेव राम को हराकर पहली बार इस क्षेत्र में कांग्रेस का खाता खोला। 1969 की हार ने क्षेत्र में कम्युनिस्ट पार्टी की मजबूत जड़ को कमजोर कर दिया। प्रदेश में चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में गैर कांग्रेसी सोसलिस्ट पार्टी बीकेडी आदि पार्टियों ने अपना रसूख कायम किया।
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