यमन में सैन्य कार्रवाई और वहां के राष्ट्रपति को लेकर गृहयुद्ध जैसे हालात हैं। ऐसे में वहां रहने वाले अपने ईष्ट से रहम की दुआ मांग रहे। लोग पलायन कर रहे हैं।
दोहरीघाट ब्लाक अंतर्गत गोठा गांव निवासी प्रमोद भी किसी तरह से अपने घर लौटने में कामयाब रहा। गांव पहुंचते ही परिवारीजन ने उसे गले लगा लिया। देश सुरक्षित आने के लिए केंद्र सरकार का शुक्रिया अदा किया। कहा कि यमन में गृहयुद्ध जैसे हालात हैं। उसने कई दिनों तक पेड़ के नीचे अपनी रात और दिन गुजारे।
दोहरीघाट ब्लाक क्षेत्र के गोठा निवासी प्रमोद रावत पुत्र स्व. शिवनाथ पांच माह पूर्व सात दिसंबर को रोजीरोटी कमाने के लिए यमन गया था। विदेश जाने के लिए उसने खेत तथा पत्नी के जेवर भी बेच दिए थे। इस बीच लगभग दो माह पूर्व यमन में भड़की हिंसा के बाद किसी तरह से अपनी जान बचाकर इधर उधर भटकता रहा।
इसी दौरान किसी से दिल्ली दूतावास का नंबर मिला। जिस पर फोन करके बताया तो पासपोर्ट मांगा गया और बराबर संपर्क में बने रहने को कहा गया। गृहयुद्ध जैसेे हालात होने से खाना मिलना मुश्किल हो रहा था।
दो-तीन दिन कहीं से पांच लोगों के लिए भोजन आ जाता था। उसी से 20 से 25 लोग भोजन करते थे। रात में अपनी जान बचाकर बाहर पेड़ के पास या झाड़ी में रहकर रात भर खड़े या बैठे रहना पड़ा।
दूतावास से संपर्क रहने पर यमन से युद्धपोत द्वारा 18 घंटे का रास्ता तय करके जीभूति पोर्ट लाया गया। वहां पर टिकट बनाकर एयरपोर्ट से दिल्ली भेजा गया।
वहीं पर दूतावास के अधिकारियों ने मिलकर बस का पास देकर रोडवेज बस पर बैठा दिया। इस संबंध में प्रमोद कुमार रावत का कहना था कि दो माह में मात्र 18 बार ही किसी तरह भोजन कर पाया था। केंद्र सरकार को धन्यवाद देते हुए कहा कि अपने देश के ही नहीं बल्कि दूसरे देश के लोग भी भारत में आकर अपनी जान बचा रहे हैं।
यहां से अपने देश को वापस जा रहे हैं। तीन बार गोली से बचने के हादसे को भूल नहीं पा रहा हूृं।