घोसी नगर के तहसील मुख्यालय के समीप दक्षिण स्थित प्राचीन सीताकुंड पोखरा विभागीय उपेक्षा और स्थानीय प्रशासन की उदासीनता के चलते बदहाल पड़ा है। प्राचीन पोखरे में दो दशक से नाले का पानी गिरने से प्रदूषण बढ़ रहा है।
अतिक्रमण के चलते पौराणिक पोखरे के अस्तित्व पर संकट गहराता जा रहा है। जलकुंभी से पोखरा पूरी तरह ढक गया है। बताया जाता है कि अपने वनवास काल के दौरान माता सीता और प्रभु श्रीराम ने इस स्थान पर समय बिताया था और माता सीता ने इस पवित्र कुंड में स्नान किया था।
मान्यता है कि यहां स्नान करने से चर्म रोग से निजात मिलती है। इसी मान्यता के चलते प्रत्येक रविवार एवं मंगलवार को लोग यहां स्नान करने आते हैं।
लगभग 15 वर्ष पूर्व नगर पंचायत की तरफ से नाले का निर्माण कराया गया, जिसके माध्यम से आसपास के घरों का गंदा पानी इसमें आकर गिरता है।
इसके पूर्व पर्यटन विभाग से 131.87 लाख रुपये का बजट आवंटित किया गया था, तब लोगों में सुंदरीकरण की उम्मीद जगी थी, लेकिन केवल कुछ सीढ़ियां बनाकर कार्य अधूरा छोड़ दिया गया।
इसके बाद कैबिनेट मंत्री एके शर्मा की ओर से पर्यटन स्थल के रूप में 2.21 करोड़ रुपये आवंटित किए गए, लेकिन बरसात के मौसम के कारण कार्य शुरू नहीं हो सका।
इससे पहले मुख्यमंत्री पर्यटन संवर्धन योजना के तहत 50 लाख रुपये आवंटित किए गए थे, परंतु कोई कार्य नहीं हो सका और प्राचीन पौराणिक सीताकुंड की स्थिति लगातार बदहाल होती गई।
समाजसेवी बुद्धिसेन मौर्य, देवेंद्र कुमार राजन का कहना है कि सीताकुंड की जलकुंभी की साफ-सफाई को लेकर कई बार शिकायत की गई, लेकिन उचित समाधान नहीं हो सका।
इस बाबत अधिशासी अधिकारी अनिल कुमार का कहना है कि यह पौराणिक सीताकुंड पर्यटन विभाग के अधीन है, इसलिए साफ-सफाई एवं अन्य कार्य पर्यटन विभाग की ओर से ही कराया जाएगा।