जिले के दोहरीघाट और सूरजपुर क्षेत्र में घाघरा की कटान से बचाव के उपाय अभी तक नहीं किए गए। अगले महीने मानसून के आगमन के मद्देनजर क्षेत्रीय लोग कटान से होने वाली तबाही को लेकर आशंकित हैं। पिछले साल क्षेत्र में घाघरा ने तबाही मचाई थी। प्रभावितों की मानें तो विभाग हर साल करोड़ों रुपया पानी की तरह बहाता है। बावजूद इसके कटान समस्या का स्थायी समाधान नहीं ढूंढ पा रहा।
बीते वर्ष दोहरीघाट तथा सूरजपुर क्षेत्र में घाघरा की कटान से भारी तबाही हुई थी। बाढ़ की विभीषिका से लोगों को बचाने के लिए ऐन वक्त पर विभाग को वैकल्पिक व्यवस्था करनी पड़ी थी। इस दौरान विभाग के करोड़ों रुपये पानी में चले गए। यह किस्सा हर वर्ष का है, बाढ़ से बचाव के नाम पर करोड़ों रुपया पानी की बहाया जाता है, इसके बाद भी कटान की समस्या का कोई स्थाई समाधान नहीं निकाला जा सका है। बीते वर्ष घाघरा नदी की कटान से नदी तट पर बने श्मशान घाट की मोटी दीवार टान में समा गई। भारत माता मंदिर के साथ खाकी बाबा की कुटी सहित कसबे के कई स्थानों पर कटान से भारी तबाही हुई थी।
रसूलपुर के पास कटान से कई एकड़ भूमि नदी में समाहित हो गई थी। यह कटान लगातार दो सप्ताह से अध़िक समय तक होती रही।
नदी की कटान से कसबे को बचाने के लिए सिंचाई विभाग के प्रस्ताव पर मुक्तिधाम के निकट 300 मीटर तक पिचिंग के लिए 10.70 करोड़ शासन ने स्वीकृत किया है।
लेकिन अब तक एक भी रुपये इस कार्य के लिए विभाग को मिला नहीं। इतना ही नहीं सिंचाई विभाग की ओर से कटान को रोकने और संभावित बाढ़ की विभीषिका से बचाव के लिए कोई कार्ययोजना ही नहीं बनाई गई है।
विभागीय उदासीनता से घाघरा नदी के तटवर्ती इलाकों के लोग तो अभी से दहशत में हैं। इसके अलावा दोहरीघाट कसबा और आस पास की ऐतिहासिक इमारतों, मंदिरों, मस्जिदों और भवनों को बचाने के लिए भी प्रशासन और सिंचाई विभाग सुस्ती में हैं।