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वाहनों के नंबर प्लेट बदलकर चलते हैं अपराधी

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मऊ। जनपद में वाहनों पर फर्जी नंबर प्लेट लगाकर अपराधी अपराधिक घटनाओं को अंजाम देते हैं। पुलिस से बचने के लिए अपराधी वाहनों पर पुलिस अथवा प्रेस भी लिखवाकर चलते हैं। अधिकांश बार ऐसे अपराधी अपराध करने के बाद बच भी निकलते हैं। कभी कभार ही पुलिस की पकड़ में आ पाते हैं। पिछले छह महीने में जनपद में विभिन्न थाना क्षेत्रों में 14 मामले प्रकाश में आ चुके हैं।
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अब तक पुलिस के समक्ष आ चुके ऐसे मामलों में जब भी कोई बड़ा अपराध करना होता है तो अपराधी वाहनों पर फर्जी नंबर प्लेट लगाते हैं अथवा बिना नंबर प्लेट के वाहनों का उपयोग करते हैं। फर्जी नंबर प्लेट अथवा बिना नंबर प्लेट के वाहन तभी पकड़ में आते हैं जब पुलिस किसी मामले में उनको पकड़ती है। सामान्यतया सामान्य चेकिंग में ऐसे मामले में पुलिस के हाथ नहीं लगते हैं।
केस नंबर 1.
सपा के कद्दावर नेता पूर्व विधायक कपिलदेव यादव की हत्या में हत्यारों ने जिन बाइकों का प्रयोग किया था। उनके नंबर फर्जी थे। एक धार्मिक आयोजन से वापस घर लौटते समय पूर्व विधायक को चार जुलाई 2010 को मझवारा बाजार में दिन दहाड़े बदमाशों ने गोलियों से छलनी कर दिया था। कुछ दूर जाने पर हत्यारे फर्जी नंबर प्लेट वाली बाइक छोड़कर एक कार से लखनऊ भाग गए थे। पुलिस ने जब बदमाशों के द्वारा छोड़ी गई बाइकों के नंबर पता लगाया तो वे फर्जी निकले थे। बाइकों के नंबर ट्रकों के थे।
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केस नं 2
शहर कोतवाली पुलिस ने दो साल पहले वाहन चोर गिरोह के कब्जे से 15 बाइकें पकड़ी गईं थीं। इन सभी वाहनों के नंबर फर्जी थे। इन मोटरसाइकिलों पर कानपुर, इलाहाबाद, लखनऊ और दिल्ली हरियाणा प्रदेशों के नंबर फर्जी लगाए गए थे। अपराधी इन मोटरसाइकिलों को प्रयोग अपराधिक घटनाओं में करते थे। इन बाइकों के नंबर प्लेट पर पुलिस, प्रेस आदि लिखकर अपराधी इनका प्रयोग करते मिले थे। केस नंबर 3.
दोहरीघाट थाने की पुलिस ने लगभग एक महीने पहले कस्बे में एक व्यापारिक डिलीवरी वाहन से लूट करने वाले दो लुटेरों को पकड़ा था। इन लुटेरों ने घटना के समय जिस बाइक का उपयोग किया था। उस बाइक पर जो नंबर प्लेट लगी थी, वह फर्जी थी। लुटेरों को गिरफ्तार करने के बाद पुलिस की पूछताछ में इस बात का खुलासा हुआ था। दोनों लुटेरे मधुबन थाना क्षेत्र के थे।
एम परिवहन से तत्काल चल जाता है पता:
परिवहन विभाग की ओर से एम परिवहन नामक ऐप विकसित किया गया है। इस ऐप के माध्यम से वाहन पर लगे नंबर से यह पता लगाया जा सकता है कि वाहन किसके नाम से पंजीकृत है। इस ऐप पर वाहन संबंधी सारी जानकारी एक क्लिक से सामने आ जाता है। लेकिन पुलिस जब कोई संदिग्ध मामला सामने आता है तभी इस ऐप का उपयोग करती है। एआरटीओ महेंद्र बाबू कहते हैं कि एम परिवहन ऐप से वाहन संबंधी सारी महत्वपूर्ण जानकारी कुछ सेकेंडों में सामने आ जाती है। जब से इस ऐप को लांच किया गया है तब से फर्जी नंबर प्लेट लगाने के प्रचलन में कमी आई है।
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