साम्यवादी आंदोलन के अग्रणी योद्धा 83 वर्षीय कामरेड पारसनाथ सिंह का मंगलवार को लंबी बीमारी के बाद बीएचयू में निधन हो गया। कामरेड के नाम से चर्चित पारस बाबू का अंतिम संस्कार सूरजपुर में घाघरा के तट पर किया गया।
मुखाग्नि उनके पुत्र क्रांति नारायण सिंह ने दी। उन्होंने सर्वहारा की लड़ाई को अपना जीवन बना लिया थ्ाा।
पारसनाथ सिंह (राय) का जन्म 13 दिसंबर 1932 को हुआ था।
इनके पिता शिव बहादुर सिंह तीन भाई थे। दूसरे नंबर पर घोसी से सांसद रहे जय बहादुर सिंह तथा तीसरे कृष्ण देव नारायण सिंह थे। उनकी जूनियर तक की शिक्षा सूरजपुर से ही हुई। इलाहाबाद विवि से उन्होंने स्नातक व परास्नातक किया।
पारस बाबू अच्छे जिमनास्ट थे। उसी की स्कालरशिप से उनकी पढ़ाई का खर्च चलता था। पढ़ाई के बाद पारसनाथ सिंह भिलाई स्टील प्लांट में काम करने लगे। यहां वे ट्रेड यूनियन से जुड़ गए, गरीबों के उत्थान के लिए लड़ाइयां लड़ीं।
1967 में जय बहादुर सिंह के निधन के बाद वे भिलाई छोड़कर घर आ गए और उनके कामों को आगे बढ़ाने में जुट गए। कम्युनिस्ट पार्टी के बैनर तले उन्होंने बलिया के नत्थूपुर (मधुबन) विस क्षेत्र से चुनाव लड़ा, जो अब मऊ का हिस्सा है। लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। बावजूद इसके उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।
सर्वहारा की लड़ाई को जीवन का मकसद बना लिया। आप मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (यूनाइटेड) के पोलित ब्यूरो के सदस्य भी रहे। प्रदेश सचिव कामरेड एम राजन, कामरेड कुलदीप सिंह (जो शहीद भगत सिंह के भाई थे), शेष नारायण सिंह जैसे बडे़ लेखकों व कामरेडों के साथ उन्होंने देश के कोने-कोने में गरीबों के हक की लड़ाई लड़ी।
पत्रकार के रूप में 'पहला अभियान' नामक अख़बार में उन्होंने कालम भी लिखे। जून माह में वे जोधपुर में एक मीटिंग के बाद घर लौटे थे ।तभी से उनकी तबियत खराब चल रही थी। रविवार को उन्हें मऊ ले जाया गया जहां से डॉक्टरों ने उन्हें बीएचयू रेफर कर दिया था।