मऊ में बारिश का मौसम शुरू हो चुका है, ऐसे दिनों में सर्पदंश की घटनाओं में भी तेजी आई है। इससे निपटने के लिए स्वास्थ्य विभाग का दावा है जिला मुख्यालय स्थित सदर अस्पताल से लेकर ग्रामीण अंचलों की सीएचसी और अन्य स्वास्थ्य केंद्रों पर पर्याप्त एंटी वेनम उपलब्ध है। बावजूद अब भी ग्रामीण क्षेत्रों में लोग सर्पदंश का शिकार होने के बाद अस्पताल पहुंचने के बजाए झाड़फूंक का सहारा लेकर अपनी जान गंवा रहें हैं। बीते एक सप्ताह में जिले में सर्पदंश से तीन लोगों की मौत हुई है। दरअसल झाड़फूंक से निराशा होने पर मरीज उपचार कराने के लिए अस्पताल पहुंचता है लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
जिला अस्पताल के साथ नौ सीएचसी सहित 50 से ज्यादा सरकारी अस्पतालों के आंकड़े देखें तो जिले में सर्पदंश से हर साल करीब 15 से अधिक मौतें होती हैं। इसमें 60 फीसदी मौत का एक कारण सर्पदंश की घटना में लापरवाही भी है। दरअसल सर्पदंश की घटना के बाद जागरूक लोग तो मरीज को अस्पताल लेकर पहुंचते है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों के अधिकांश लोग झाड़फूंक में अपनी आस्था रखते हैं। इसके पीछे मुख्य कारण इनकी जागरुकता का अभाव और अंधविश्वास का परचम है। लोग सर्पदंश होने पर झाड़फूंक कराने के लिए कुछ सिद्ध स्थानों पर जाते हैं।
वहीं इस संबंध में डॉक्टरों का कहना है कि सर्पदंश का शिकार व्यक्ति का यदि समय से इलाज पा जाए तो उसकी जान बचने की संभावना अधिक होती है। वर्तमान में जिले के दोहरीघाट, सूरजपुर, रसूलपुर, मधुबन के देवरांचल का क्षेत्र तो बाढ़ से ग्रस्त हैं। इससे इन क्षेत्रों में सर्पदंश की घटनाएं ज्यादा हो रहीं हैं। इस माह सर्पदंश के सात से अधिक मामले आ चुके हैं, जिसमें 30 फीसदी मरीजों की मौत झाड़फूंक के चक्कर में हुई।
सदर अस्पताल के फिजिशियन डॉ. अनिल कुमार ने बताया कि कोई जरूरी नहीं हर सांप जहरीला हो, सांपों की बहुत सी प्रजाति विष रहित होती है। बहुत से सांप ऐसे होते है जिनका जहर सिर्फ चूहे और पक्षियों पर होता है। हालांकि इनका जहर पांच वर्ष तक के बच्चों के लिए घातक हो सकता है। ग्रीन वाइन स्नेक तथा कैट स्नेक, जब ये किसी को काटते हैं, तो काटे हुए स्थान में 3-4 घंटे दर्द और सूजन रहता है। सांपों में केवल नाग, करैत और वाईपर की 13 प्रजातियां की खतनराक और जानलेवा होती है। जबकि अजगर, धामिन, ड़ोढ़िया, हुरहुरिया सांप बिना जहर के होते है। इन सांपों के काटने पर भी लोग हदस कर अपनी जान गंवा देते है।
सर्पदंश की घटनाओं पर विशेषज्ञों का कहना है कि सर्प दंश के शिकार मरीज को यदि समय से उपचार मिले, तो उसकी जान बचाई जा सकती है। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में आधुनिकता के इस समय में भी अधिकांश लोग सर्प दंश होने पर अंधविश्वास की जद में आकर ओझा-सोखा और झाड़-फूंक के चक्कर में फंस जाते हैं। जिला अस्पताल के फिजिशियन डॉ. शैलेष कुशवाह की माने तो सांप काटने के बाद शुरुआती कुछ मिनट बेहद अहम होते हैं। ऐसे में सर्प दंश के बाद मरीज कत्तई न घबराए, क्योंकि घबराने पर शरीर में रक्त का संचार तेज होता है, ऐसे में जहर तेजी से रक्त में घुलने लगता है। दौड़े न कम चले, क्योंकि दौड़ने या तेज चलने पर भी शरीर में रक्त का संचरण तेज होता है। काटने वाले सांप पर फोकस करें, ताकि पता चल सकें डंसने वाला सांप किस प्रजाति का था, उसके दंश से कितना जहर शरीर में प्रविष्ट हुआ होगा।
केस एक- रतनपुरा ब्लाक के अरदौना ग्रामपंचायत निवासी विकास प्रजापति (6) पुत्र उमेश को बीते 17 जुलाई को जहरीले सांप ने डस लिया। घटना के बाद उसे एक सिद्ध स्थान पर लेकर पहुंचे, जहां उसकी हलात गंभीर होने पर नगर के एक निजी अस्पताल लेकर पहुंचे। जहां उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई।
केस दो- रतनपुरा ब्लाक के करऊत पंचायत निवासी विभाग यादव (14) पुत्र उमाशंकर बीते 27 जुलाई की रात में सांप ने डस लिया। यहां भी अस्पताल ले जाने में लापरवाही की गई। फलस्वरूप किशोरी को देर से इलाज मिलने से मौत हो गई।