मऊ। जंग-ए-आजादी में अपना सब कुछ न्यौछावर कर देने वाले पं. अलगू राय शास्त्री की एक अदद आदमकद प्रतिमा तक जिले में नहीं है। मुख्यालय पर रोडवेज के पास लगी छोटी प्रतिमा आज जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों की उपेक्षा के चलते बेहाल है। हालांकि अलगू राय शास्त्री के स्मारक को वर्ष 2010 में पार्क बनाने के लिए रोटरी ने गोद लिया। इसके बाद अपेक्षाकृत भी कोई काम नहीं किया गया।
स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में बेटे और पत्नी के साथ जेल जाने वाले पं. अलगू राय शास्त्री पूर्वांचल के इकलौते सेनानी थे। देश को आजाद कराने के जुनून में अपने जवान बेटे का समुचित इलाज नहीं करा सके और उसकी मौत हो गई। स्वतंत्रता संग्राम में इन्होंने सात बार जेल यात्रा करनी पड़ी। बापू के आह्वान पर स्नातक की पढ़ाई छोड़कर आजादी की लड़ाई में कूदे शास्त्री के पुश्तैनी मकान में अंग्रेजों ने दो बार आग लगा दी। आजमगढ़ बनारस सहित पूर्वांचल से लेकर पूरे प्रदेश ही नहीं अपितु मेरठ से लेकर लाहौर तक इन्होंने क्रांतिवीरों को संगठित किया। जिले के अमिला गांव निवासी अलगू राय आजादी की लड़ाई में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह करने के आरोप में सबसे पहली बार 1920 में गिरफ्तार कर लिए गए थे। इसके बाद 1923, 1930, 1932, 1933, 1940 और 1942 में गिरफ्तार कर लिए गए। अंग्रेजों ने इन्हें इनके बेटे अरविंद राय और पत्नी परमेश्वरी देवी के साथ गिरफ्तार कर लिया। इन्हें मेरठ जेल भेज दिया गया। उन दिनों मेरठ जेल में राजेंद्र बाबू की बहन भी कैद थीं। परमेश्वरी देवी को उन्हीं के साथ जेल में रखा गया था। आजादी की लड़ाई के दौरान अलगू राय का पूरा समय देश के विभिन्न क्षेत्रों में दौरों में ही बीतता रहा। इसलिए वे अपने बेटे अरविंद का इलाज ठीक तरीके से नहीं करा सके और इकलौते बेटे का निधन युवावस्था में ही हो गया। आजादी के बाद देश के विभाजन का विरोध इन्होंने जमकर किया था। जिससे नेहरू इनसे नाराज भी हो गए थे। ये सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनाये जाने के पक्षधर थे।
उर्दू को दूसरी राष्ट्रभाषा बनाना चाहते थे
मऊ। पं.अलगू राय शास्त्री देश में उर्दू कोक दूसररी राष्ट्रभाषा बनाना चाहते थे। उन्होंने हैदराबाद में जेल में रहने के दौरान ‘शहीदाने उर्दू’ नामक किताब भी लिखी थी। इसके अलावा उन्होंने लखनऊ जेल में बंदी जीवन बिताने के दौरान ‘ऋग्वेद रहस्य’ नामक पुस्तक भी लिखी। जिस पर आजादी के बाद उन्हें मंगला प्रसाद पारितोषिक साहित्यिक पुरस्कार भी दिया गया। अंग्रेजी शासन काल में 1937 में संयुक्त प्रांत के सगड़ी नत्थूपुर से मेंबर चुने गए। देश के आजाद होने के बाद 1952 में बलिया पश्चिम और आजमगढ़ पूर्व सीट से सांसद चुने गए। प्रधानमंत्री नेहरू की नराजगी की परवाह न कर इन्होंने 1955 में संसद में मोरार जी देसाई द्वारा संविधान संशोधन का समर्थन किया। आजादी के बाद संविधान निमातृ समिति के सदस्य के रूप में इन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ऐसे सपूत को जनप्रतिनिधियों ने भी भुला दिया
मऊ। देश के लिए सब कुछ कुर्बान कर देने वाले ऐसे सपूत को आजादी के बाद जनप्रतिनिधियों ने भी भुला दिया। उनकी एक अदद आदमकद प्रतिमा नहीं लागई जा सकी। अलगू राय के भाई के पौत्र सत्यव्रत राय शास्त्री ने 1998 में अलगू राय की आदम कद प्रतिमा लगाए जाने के लिए प्रयास रत हुए। उन्होंने सभी जनप्रतिनिधियों से मुलाकात कर आदमकद प्रतिमा लगवाने का निवदेन किया। घोसी विधान सभा का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रदेश सरकार के तत्कालीन संस्कृति मंत्री फागू चौहान ने सरकार के पास ब जट न होने का हवाला देते हुए असमर्थता जता दिया। उन्हीं के प्रयास से स्वतंत्रता सेनानी संस्थान से मिली छोटी सी रकम से रोडवेज पर छोटी सी प्रतिमा लगाई गई है।