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26 स्कूली बसें मानक से दूर हैं

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मऊ। शिक्षा सत्र का चौथा माह चल रहा है, लेकिन स्कूली बच्चों की सुरक्षा के प्रति न तो जिला प्रशासन और न ही संबंधित विभागीय अधिकारी गंभीर हैं। निजी स्कूलों में वाहन सुविधा का लोभ दिखाकर बच्चों का नामांकन करने वाले अधिकांश स्कूल संचालक खटारा वाहनों में बच्चों को ले जाते हैं। इन वाहनों का न तो फिटनेस ठीक है और न ही इनकी परिवहन विभाग से स्कूली वाहन के तौर पर इसका रजिस्ट्रेशन ही कराया गया है। जबकि विभागीय अभिलेखों में मात्र 26 स्कूली बस अनफिट पाई गई हैं। बस संचालकों को नोटिस जारी की गई है। जबकि वास्तविकता कुछ और ही है।
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जिले में 542 निजी स्कूल हैं। आए दिन हादसों के बाद भी जिले में ओवरलोड स्कूली वाहनों पर लगाम नहीं लग पा रही है। इसके प्रति स्कूल प्रशासन से लेकर, अभिभावक और प्रशासन भी गंभीर नहीं है। स्कूली बसों में फर्स्ट एड बाक्स, पीने के पानी आदि सुविधाएं भी होना जरूरी है, जिसका कत्तई ध्यान नहीं रखा जा रहा है। वर्षों पूर्व रानीपुर ब्लाक के महासो में स्कूली बस ट्रेन से टकरा गई थी। तब रेल हादसे ने लोगों झकझोर दिया था। कहने को तो विभागीय अभिलेखों में 250 स्कूल बसें तथा 248 छोटे वाहन स्टाफ को लाने के नाम पर पंजीकृत हैं। स्टाफ के वाहनों पर ही स्कूली बच्चों को ढोने का काम किया जा रहा है। 20 वर्ष पुरानी कई बसें भी सड़कों पर दौड़ रही हैं। स्कूल वाहन के लिए केवल बसें ही मान्य हैं, बावजूद इसके टेंपो, मैजिक वैन और तमाम छोटे बड़े स्कूल वैन के नाम पर बच्चों को ढो रही हैं। वह भी क्षमता से अधिक। यही नहीं इन स्कूली वाहनों में बच्चों को अतिरिक्त सीटें अथवा बेंच लगाकर ले जाया जाता है। यही नहीं बच्चे वाहन के गेट पर भी बैठकर स्कूल आते-जाते दिख जाते हैं।
विभाग की तरफ से अब तक मानक के अनुरूप न मिलने पर 40 स्कूल बसों का चालान काटा गया। मात्र अनफिट 26 बसों के संचालकों को नोटिस दी गई है। इस बाबत एआरटीओ प्रशासन कहकशा खातून का कहना है कि अनफिट 26 स्कूल बस संचालकों को नोटिस दी गई है। छोटे सवारी वाहन से स्कूली बच्चे को ले जाना गैर कानूनी है। ऐसे संचालकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
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