अखाड़ा, कुश्ती, पहलवान, धोबी पाट, चरखा दांव और घुटना दांव जैसे अल्फाज जब कल से रिलीज होने वाली फिल्म सुल्तान के डायलॉग में सुनाई देंगे तो लाजमी है कि हमारे ‘सुल्तानों’ की भुजाएं भी फड़कने लगेंगी। जोश आए भी क्यों नहीं। ब्रज के अखाड़ों में तैयार हुए हमारे ‘सुल्तानों की धाक’ तो देश भर में है। मिट्टी में यदि कुश्ती हो तो यह किसी को भी पछाड़ सकते हैं।
श्रीकृष्ण की इस धरती से अखाड़ों और कुश्ती का बहुत पुराना ताल्लुक है। कृष्ण के भड़े भ्राता बलदाऊ भी कुश्ती के शौकीन थे। कंस के नामी पहलवान मुष्टिक और चांडूर को बलदाऊ ने एक ही दांव में धूल चटा दी थी। यदि पुराने पहलवानों की मानें तो कभी ब्रज में 1000 से भी ज्यादा अखाड़े हुआ करते थे।
देश के किसी भी हिस्से में कुश्ती क्यों न हो ब्रज के पहलवान वहां जोर आजमाइश करने जरूर जाते। गांव बल्टीकरी निवासी कैप्टन मुख्तियार सिंह को 1967 में कुश्ती में अर्जुन पुरस्कार मिला था। तेहरान में 1970 में हुए एशियन गेम में स्वर्ण पदक हासिल किया। 1966 और 1970 में हुए कॉमनवेल्थ गेम में उन्हें स्वर्ण पदक मिला।
शिवाले पहलवान आल इंडिया पुलिस प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक हासिल कर चुके हैं। भारत केसरी कुश्ती दंगल में भी वह भिड़े थे। वह उत्तर प्रदेश केसरी भी रह चुके हैं। शिवाले पहलवान आज नौजवानों को कुश्ती के दांव सिखा रहे हैं। सिहोरा गांव निवासी देवेंद्र पहलवान भी कई राज्यों में कुश्ती प्रतियोगिता में हिस्सा ले चुके हैं।
ब्रज केसरी भी रह चुके हैं। यूनिवर्सिटी की आल इंडिया कुश्ती प्रतियोगिता में उन्हें चैंपियन घोषित किया गया। वह आज नए लड़कों को कुश्ती सिखा रहे हैं। जिला कुश्ती एसोसिएशन के सचिव ब्रजमोहन सिंह आल इंडिया यूनिवर्सिटी तीन दफा, यूपी यूनिवर्सिटी में सिल्वर मेडल प्राप्त किया। जूनियर नेशनल में भी भिड़े।
उनका कहना है कि आज भी ब्रज क्षेत्र पहलवानी के मामले में सबसे आगे हैं। जिले में अखाड़ों की संख्या 200 के करीब है। पूर्व में स्टेडियम के कोच रह चुके देवेंद्र सिंह का मानना है कि यहां के पहलवान मिट्टी में कुश्ती ज्यादा लड़ते हैं। उन्हें वही अभ्यास भी है। यदि अखाड़ों पर मेट की व्यवस्था हो जाए तो काफी सुधार हो सकता है। मथुरा के करीब 500 पहलवान हर साल उत्तर प्रदेश में होने वाली प्रतियोगिताओं में प्रतिभाग करते हैं। यहां करीब 800 नौजवान पहलवानी सीख रहे हैं।
सिहोरा में होती है 7.5 लाख की कुश्ती
ब्रज क्षेत्र के गांव सिहोरा में हर साल होने वाले दंगल में देश और विदेशों से पहलवान आते हैं। कुश्ती फतह करने वाले को साढ़े सात लाख का पुरस्कार मिलता है। रामनवमी के दिन यह दंगल आयोजित होता है। पिछले साल रूस तक से पहलवान आए थे।
कई प्रदेशों में पदक जीत चुके हैं मथुरा के राधाकृष्ण
नाम राधाकृष्ण, उम्र 30 साल और छह फुट लंबा, चौड़ा शरीर। न बोल सकता है और न ही सुन सकता है, लेकिन देश के कई राज्यों में कुश्ती लड़कर बड़े-बड़े पहलवानों को चित कर चुके हैं। आस्ट्रेलिया में भी वह अपने दांव दिखा चुके हैं।
कैलाशनाथ का यह बेटा राष्ट्रीय मूकवधिर चैंपियनशिप में हिस्सा ले चुका है। इसके अलावा दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, जम्मू, मध्य प्रदेश में हुई प्रतियोगिता में भी पदक हासिल किया। सैफई में हुई प्रतियोगिता में भी हिस्सा लिया था।
कैलाशनाथ ने बताया कि मुलायम सिंह ने राधाकृष्ण की पहलवानी को देखकर उसे लखनऊ बुलाया था, लेकिन जा ही नहीं पाए। उनके परिवार वालों का कहना है कि इतने पदक और सर्टिफिकेट तो मिल गए, लेकिन दो वक्त की रोटी का कोई जुगाड़ नहीं हो रहा है। यदि इसकी कहीं नौकरी लग जाती तो जीवन कट जाता।
अखाड़े के ‘शेर’ गद्दों पर हो जाते ‘ढेर’
ब्रज के पहलवान मिट्टी पर होने वाली कुश्ती में तो शेर रहते हैं, लेकिन गद्दों पर होने वाली प्रतियोगिता में कमजोर पड़ जाते हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह है कि इन लोगों को गद्दों पर कुश्ती लड़ने की प्रैक्टिस ही नहीं है।