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Mathura News: श्रद्धा-भक्ति के धरातल पर खास है वृंदावन की वन संस्कृति

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मनमोहन पारीक
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वृंदावन। वृंदावन के साथ जुड़ा वन शब्द आज भले ही वृंदा की उस मूल स्थिति को नहीं दर्शाता हो, जहां लता-पता और वृक्षावलियां ही इस नगर की मुख्य पहचान थीं। इस पहचान की समृद्ध सांस्कृतिक यात्रा है। श्रृद्धा-भक्ति के धरातल पर नगर की प्राचीन वन संस्कृति लगभग 6वीं सदी में महाकवि कालीदास से लेकर सन 1829 के दौरान नगर यात्रा को आए फ्रांसिसी यात्री जैक मांट ने इसे हरा द्वीप बताया, लेकिन अब वह हरित वृंदावन तेजी से कंक्रीट के वन में बदलता जा रहा है। इसके बावजूद नगर के प्राचीन धर्म स्थल यहां आने वाले भक्तों को पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे रहे हैं।
सदियों से वन संस्कृति के लिए जाना जाने वाला वृंदावन का स्वरूप विकास के नाम पर खोता जा रहा है। अपनी प्राचीन छाप को मिटाकर अब बहुमंजिला इमारतों के रूप में दिखने लगा है। 6वीं सदी में महाकवि कालिदास ने रघुवंश महाकाव्य में चैत्ररथ के उद्यान की उपमा नगर से की थी। वृंदावने चैत्र रथादनूने निर्विश्यतां सुंदरि यौवनश्री... चैत्ररथ का उद्यान वृंदावन की तरह सुंदर है। वहीं वर्ष 1829 के दौरान यहां यात्रा पर आए आए फ्रांसिसी यात्री जैक मांट ने इसे एक हरे द्वीप की तरह बताया है। नगर की लता वृक्षावलियां श्रद्धा के धरातल पर जिस सांस्कृतिक यात्रा को दर्शाती हैं, वह खास है। 16वीं सदी के दौरान यह जिन विविधताओं के साथ मुखरित होता है, वह पर्यावरण के संदर्भ में वन-वृंदावन को एक धरोहर के रूप में स्थापित करने वाला है। संवाद
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साहित्य संगीत और कला परंपराओं से सिंचित पर्यावरण
एक समय था जब पर्यावरण संकट जैसा शब्द कल्पना से परे था। उस दौर में वृंदावन की लता पताओं को प्रभु लीला का साक्षी मानकर साधकजन यहां साधनारत रहे। भाव था कि उनके आराध्य यहां की लता-पताओं में विहार करते हैं। वृक्षावली से परिपूर्ण वृंदावन राधाकृष्ण को अति प्रिय है। वह स्वयं वृंदा- विपिन की लता-पताओं का यशगान करते हैं। वाणी ग्रंथों में लिखा है- गावत वृंदा विपिन गुन, स्वयं लाड़िली लाल... सुखद लता फल फूल द्रुम, अदभुत परम रसाल। समयान्तराल का यह भाव विविधताओं के साथ दिखने लगा। नगर के मंदिरों में आयोजित होने वाले फूल बंगला, मंडली, पुष्पकली शृंगार, खसखाना, गुलाब डोल, फूल डोल और सावन के झूले जैसे उत्सव आज भी इस भाव के साक्षी हैं। विगत पांच शताब्दियों में यहां निंबार्क, वल्लभ, गौड़ीय, राधाबल्लभ, हरिदासी, ललित और चरणदासी आदि वैष्णव परंपराओं में रचित अपार ब्रजभाषा साहित्य इसकी साहित्यिक गहराइयों को बताता है।


संरक्षण के साथ गाया भी जाता है पर्यावरण
जहां देश दुनिया में पर्यावरण के संरक्षण करने की बात कही जाती है। बिगड़ते पर्यावरण को लेकर चिंता जताई जा रही है। वहीं नगर में सैकड़ों वर्ष से पर्यावरण का संरक्षण और चिंतन ही नहीं, बल्कि उसको साधकों ने वाणी में उतारा है। मंदिरों में राग सेवा के रूप में इनके गायन की परंपरा उत्सवों के महत्व को बढ़ाती है। यहां पर्यावरण का महत्व बताने वाले उत्सवों के दौरान जब फूल बंगलों के मध्य पुष्प कलियों का शृंगार किए प्रभु के समक्ष राग सेवा के रूप में गायन होता है, तो श्रद्धालु अभिभूत हो उठते हैं।
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पारंपरिक दृष्टि से दर्शित वन वृंदावन
वृंदावन शोध संस्थान के शोध अधिकारी डॉक्टर राजेश शर्मा ने बताया कि आज भले ही लता-वृक्षावलियों से आच्छादित वह वृंदावन खोजने से नहीं मिलता, जिसकी जानकारी परंपराबद्ध पांडुलिपियों और बुजुर्गों के संस्मरणों से मिलती है। मंदिरों में आयोजित होने वाले प्रकृति से जुड़े उत्सव भी लेखन और गायन की परंपरा में पाए जाते हैं। लेखन और गायन की समृद्ध परंपरा सेवाकुंज, निधवन, किशोरवन, टटिया स्थान जैसे स्थलों में निभाई जा रही है।
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