वृंदावन। अमेरिकी आयात शुल्क और अंतरराष्ट्रीय तनाव से वृंदावन के धार्मिक उत्पादों के विदेशी कारोबार पर असर पड़ा है। व्यापारियों का दावा है कि निर्यात में 60 से 70 प्रतिशत तक गिरावट आई है। ऐसे में कारोबारी रूस और यूरोपीय देशों में नए बाजार तलाश रहे हैं।
वृंदावन से तुलसी माला, कंठी, ठाकुरजी की पोशाक, मुकुट-शृंगार, मूर्तियों, लकड़ी के मंदिरों और पूजन सामग्री का विदेशों में कारोबार होता है। व्यापारियों के अनुसार, इस कारोबार का सालाना मूल्य करीब 150 करोड़ रुपये है। अमेरिका में कृष्ण भक्तों और इस्कॉन मंदिरों के कारण इन उत्पादों की अच्छी मांग रहती थी, लेकिन बढ़ी लागत से वहां बिक्री प्रभावित हुई है। संवाद
मूर्तिकार राजेंद्र आचार्य ने बताया कि जलमार्ग से अमेरिका भेजे गए उनके दो कंटेनर छह माह से अधिक समय से बंदरगाह पर पड़े हैं। इनमें लकड़ी के दरवाजे, ठाकुरजी की पोशाक, लकड़ी और संगमरमर के मंदिर तथा श्रीराधाकृष्ण, निताई गौर और श्रील प्रभुपाद की मूर्तियां शामिल हैं। उनके मुताबिक, माल भेजने के समय मिले ऑर्डर बाद में बढ़ी लागत के कारण प्रभावित हुए। अब ग्राहक अधिक कीमत चुकाने से कतरा रहे हैं। उन्होंने यह भी बताया कि विदेश भेजे जाने वाले सामान की कूरियर फीस में करीब 20 प्रतिशत वृद्धि हुई है, जिसके चलते छोटे उत्पाद डाक सेवा से भेजे जा रहे हैं।
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तुलसी कंठी कारोबारी लक्ष्मीनारायण दीक्षित ने बताया कि लोई बाजार के 150 से अधिक व्यापारी अंतरराष्ट्रीय बाजार से जुड़े हैं। उन्होंने बताया कि अमेरिकी आयात शुल्क में बदलाव और अंतरराष्ट्रीय तनाव से कारोबार प्रभावित हुआ है। इसका असर कार्तिक मास में भी देखने को मिला, जब पिछले वर्षों की तुलना में ग्राहकों की संख्या कम रही। उनके मुताबिक, यहां के उत्पाद कुछ निर्यातकों के माध्यम से विदेश भेजे जाते हैं और बाजार के कई दुकानदार विदेशी मांग पर निर्भर हैं।
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मुकुट-शृंगार और किताबों के कारोबारी आलोक अग्रवाल ने बताया कि पिछले एक वर्ष में विदेशी ग्राहकों के ऑर्डर घटे हैं। उनके अनुसार, पहले नियमित रूप से मिलने वाले कई ऑर्डर बंद हो गए हैं और कारोबार में 60 प्रतिशत से अधिक गिरावट आई है। उन्होंने कहा कि बढ़ती लागत के कारण विदेशों में वृंदावन के उत्पादों की बिक्री करना मुश्किल हो रहा है।