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माई री सहज जोरी प्रकट भई...

Sun, 04 Dec 2016 11:42 PM IST
ब्यूरो, अमर उजाला मथुरा
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बांकेबिहारी मंदिर
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बिहार पंचमी पर संगीत सम्राट स्वामी हरिदास महाराज के लाड़ले ठाकुर बांकेबिहारी का प्राकट्योत्सव रविवार को वृंदावन में धूमधाम के साथ मनाया गया। बांकेबिहारी की प्राकट्यस्थली निधिवनराज से लेकर बांकेबिहारी मंदिर तक विविध धार्मिक आध्यात्मिक कार्यक्रम हुए।
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रविवार सुबह निधिवनराज मंदिर स्थित ठाकुर बांकेबिहारी महाराज की प्राकट्यस्थली में धार्मिक अनुष्ठान शुरू हो गए। सुबह पांच बजे सेवायत भिक्की गोस्वामी, आचार्य गोपी गोस्वामी, रोहित गोस्वामी, बच्चू गोस्वामी, महामंडलेश्वर ज्ञानानंद महाराज सहित श्रद्धालुओं ने प्राकट्यस्थली का पंचामृत से महाभिषेक किया।

निधिवनराज स्वामी हरिदासजी और आराध्य बांकेबिहारी के गगनभेदी जयकारों से गुंजायमान हो रहा था। माई री सजह जोरी प्रगट भई, जु रंग की गौर-स्याम घन-दामिनि जैसैं। प्रथम हूं हुती, अब हूं आगें हूं रहिहै, न टरिहै तैसैं।। अंग-अंग की उजराई-सुघराई-चतुराई-सुन्दरता ऐसैं। श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा-कुंजबिहारी, सम वैस वैसैं।। केलीमाल के पाठ और भक्तों के मंगल समाज बधाई गायन ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
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बधाई शोभायात्रा में बही भक्ति की रसधारा
बांकेबिहारी महाराज के प्राकट्योत्सव पर रविवार सुबह 8:30 बजे से निधिवनराज मंदिर से बधाई शोभायात्रा निकाली गई। यह नगर के प्रमुख मार्गाें से होती हुई दोपहर बाद बांकेबिहारी मंदिर पहुंची। इसमें भगवान गणेश, राधाकृृष्ण, बांकेबिहारी महाराज की झांकी के साथ मुख्य डोले में अपने लाड़ले ठाकुर बांकेबिहारी महाराज को संगीत शिरोमणि स्वामी हरिदासजी गोद में लिए विराजमान थे।

शोभायात्रा में संत अपने अखाड़ाें के चिह्न लेकर चल रहे थे। विभिन्न राज्यों से आई महिलाएं और युवतियों का नृत्य और डांडिया आकर्षण का केंद्र रहा। दोपहर 1:30 बजे शोभायात्रा बांकेबिहारी मंदिर पहुंचने पर सेवायतों ने आरती उतार कर स्वागत किया। इसके बाद बांकेबिहारी महाराज का भोग लगाया और राजभोग आरती हुई।

ठाकुरजी ने स्वर्ण-रजत पोशाक में दिए दर्शन
प्राकट्योत्सव पर बांकेबिहारी मंदिर के प्रमुख गेट से लेकर मंदिर प्रांगण को केसरिया रंग से सजाया गया। कपड़ों से लेकर गुब्बारे भी केसरिया रंग के थे। मंदिर में गुलाब, हिना और केसर के इत्र का छिड़काव किया गया। इससे पूर्व सुबह सात बजे मंदिर सेवायतों ने घी, शहद, बूरा, दूध, दही और गुलाबजल से ठाकुरजी का अभिषेक कराया। इसके बाद ठाकुरजी को स्वर्ण-रजत पोशाक धारण कराई गई। इसके बाद भक्तों को पंचामृत बांटा गया। अपने आराध्य के दर्शन के लिए मंदिर में भारी भीड़ उमड़ पड़ी।
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