आगरा में वायु प्रदूषणों के आंकड़े सवालों के घेरे में आ गए हैं। ताजमहल के पास जहां वाहनों का संचालन प्रतिबंध है, चारों ओर हरियाली है, वहां एक्यूआई 349 दर्ज किया गया है। जिन सड़कों पर धूल और धुएं का अंबार है, वहां एक्यूआई सिर्फ 96 रिकाॅर्ड किया गया।
आगरा की ये दो तस्वीरें हैं, जिन पर उस क्षेत्र का एयर क्वालिटी इंडेक्स यानी वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) दर्ज है। हरियाली से घिरे और वाहनों के प्रतिबंध वाले ताजमहल में एएसआई की लैब में एक्यूआई 349 है। वहीं, धूल के गुबार, दो किमी हिस्से में खुदी सड़क वाले संजय प्लेस क्षेत्र में यूपीपीसीबी के आंकड़ों में एक्यूआई महज 96 है। ये आंकड़े सरकारी सिस्टम की गड़बड़ी की पोल खोलते हैं।
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उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) का यही आगरा मॉडल है, जिसमें धूल के गुबार के बाद भी पूरे शहर का एक्यूआई 100 तक पहुंच रहा है। हकीकत में 500 मीटर दायरे में खुदाई, वाहनों के संचालन पर प्रतिबंध वाले ताजमहल क्षेत्र में यह 349 है। ताज पर प्रदूषण का आंकड़ा केंद्र सरकार के भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की लैब का है, जो दशहरा घाट की ओर उत्तर-पूर्वी बुर्ज पर स्थापित है।
शनिवार को ताजमहल के मेहमानखाने में लगे डिस्प्ले बोर्ड पर पर्टिकुलेट मैटर पीएम-10 की मात्रा 349 क्यूबिक प्रति घनमीटर दिखाई गई, जबकि पीएम-2.5 की मात्रा 249 क्यूबिक प्रति घनमीटर रही। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की लैब के यह प्रदूषण संबंधी आंकड़े विश्व धरोहर के संरक्षण में इस्तेमाल किए जाते हैं।
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लैब से एक किमी दूर चलते हैं वाहन
ताजमहल के दशहरा घाट पर जहां एएसआई की लैब है, वह जगह चारों ओर से हरियाली से घिरी है। वाहनों का संचालन एक किमी दूरी पर होता है। एक ओर यमुना नदी है, जिसमें दोनों छोर तक पानी भरा है और रेत नजर नहीं आ रही है। यहां एक्यूआई 349 है। इसके उलट यूपीपीसीबी का ऑटाेमेटिक स्टेशन ताज पश्चिमी गेट स्थित नीम तिराहे पर मौजूद शाहजहां गार्डन में लगा है। यहां पुरानी मंडी चौराहे से निकलने वाले भारी वाहन और सड़कों पर उड़ती धूल के बाद भी एक्यूआई 72 दर्ज किया गया। दोनों में करीब पांच गुने का अंतर है।
आंखों में जलन, नाक में खुजली और सीने में जकड़न
धूल-धुआं बढ़ने के कारण लोगों को आंखों में जलन, करकराहट, नाक की एलर्जी, खुजली, पानी आना, सीने में जकड़न, गले में खराश, खांसी, सांस फूलने की परेशानी आ रही है। खासतौर से अस्थमा और सांस रोगियों की परेशानी बढ़ गई है। एसएन मेडिकल कॉलेज में ऐसे मरीजों की संख्या में बीते सप्ताह से 15 फीसदी तक बढ़ गई है। वक्ष एवं क्षय रोग विभाग के डॉ. गजेंद्र विक्रम सिंह ने बताया कि धूल-धुआं के कण सांस नलिकाओं में संक्रमण पैदा करते हैं। इससे सांस लेने में कठिनाई होती है। लोग घर से निकलते समय मास्क लगाएं। अस्थमा मरीज अपनी दवाओं का विशेष ध्यान रखें।
प्रदूषण मापक यंत्रों पर पानी का छिड़काव करके एक्यूआई कम दिखाकर वाहवाही लूटी जा रही है। यह लोगों से धोखाधड़ी है। एएसआई, सीबीसीबी और यूपीपीसीबी, तीनों में किसके आंकड़े सही हैं, यह स्पष्ट किया जाए। -डॉ. शरद गुप्ता, पर्यावरणविद, याचिकाकर्ता
जब तक प्रदूषण के असली आंकड़े नहीं बताएंगे, तब तक निवारण कैसे होगा। यह कागजी खेल हमारे बच्चों की सेहत के लिए खतरनाक है। यूपीपीसीबी स्टेशनों के कैलिब्रेशन की जांच होनी चाहिए। -डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ, पर्यावरणविद, याचिकाकर्ता
यूपीपीसीबी जो ऑटोमेटिक स्टेशन लगवाता है, वह सीपीसीबी की ओर से जारी मानकों पर ही लगते हैं। ताज पर डाटा में अंतर क्यों है। इसकी जांच करा ली जाएगी। इतना अंतर नहीं आना चाहिए। संभव है कि फिल्टर पेपर की परंपरागत तकनीक में ही कोई दिक्कत हो। -रामगोपाल, चीफ एनवायरमेंट ऑफिसर, यूपीपीसीबी
हमारी लैब फिल्टर पेपर तकनीक से पूरे 24 घंटे का आंकड़ा तैयार करती है। इसमें कोई छेड़छाड़ संभव नहीं है। हमने इसी लैब के आंकड़ों के आधार पर कई अध्ययन किए हैं। यूपीपीसीबी के आंकड़ों को मैंने देखा नहीं और न ही कोई टिप्पणी नहीं कर पाऊंगा। -डॉ. एमके भटनागर, निदेशक, एएसआई साइंस ब्रांच