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निरंकार परमात्मा से जुड़कर ही हो पायेगा आत्ममंथन: माता सुदीक्षा

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मथुरा। सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने कहा कि आत्ममंथन एक भीतर की यात्रा है। इसे केवल चंचल मन और बुद्धि के स्तर पर नहीं तय किया जा सकता। इसके लिए अपने अंदर आध्यात्मिक रूप में मंथन करने की जरूरत है।
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हरियाणा के समालखा स्थित निरंकारी आध्यात्मिक स्थल पर 78वें वार्षिक निरंकारी संत समागम में सतगुरु माता ने आत्ममंथन पर प्रकाश डाला। मीडिया सहायक किशोर स्वर्ण ने बताया कि मथुरा जोन के जोनल इंचार्ज एचके अरोड़ा के साथ ब्रज क्षेत्र से पहुंचे हजारों भक्त सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज का आशीर्वचन प्राप्त कर रहे हैं। 31 अक्तूबर से 3 नवंबर तक चलने वाले संत समागम के पहले दिन मानवता के नाम संदेश देते हुए सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने कहा कि हर मानव के अंदर और बाहर एक सत्य निवास करता है, जो स्थिर और शाश्वत है। इसी सत्य को पहले जानना होगा। जब मनुष्य को हर किसी के अंदर इस सत्य का दर्शन होगा तो फिर उसके मन में सबके प्रति प्रेम का भाव उत्पन्न होगा। वास्तव में परमात्मा ने मनुष्य को इस तरह ही बनाया है, जिससे उसके मन में प्रेम भाव की प्राथमिकता हो, लेकिन अज्ञानता के कारण मनुष्य एक-दूसरे से नफ़रत करने के कारण ढूंढ लेता है।
सतगुरु माता व निरंकारी राजपिता रमित जी की छत्रछाया में आयोजित संत समागम के शुभारंभ पर दिव्य युगल को एक फूलों से सुसज्जित खुली पालकी में विराजमान कर शोभायात्रा के रूप में समागम पंडाल के मध्य से मुख्य मंच तक ले जाया गया, जहां उनका स्वागत निरंकारी इंस्टीट्यूट ऑफ म्यूज़िक एंड आर्टस (एनआईएमए) के 2500 से भी अधिक छात्रों ने भरत नाट्यम एवं स्वागत गीत से किया।
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