वरिष्ठ सपा नेता भले ही संघर्ष विराम की बात कर रहे हों, लेकिन अभी पार्टी में सब कुछ ठीक नहीं हैं। शह मात का खेल अभी जारी है। प्रदेश अध्यक्ष बनते ही शिवपाल यादव ने भतीजे और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बेहद करीबी डा. संजय लाठर को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है। राजनीतिक हल्कों में इसे उनुका मुख्यमंत्री पर पलटवार माना जा रहा है।
वर्ष 2012 में बहुमत के बाद उत्साहित समाजवादी पार्टी ने मांट के उपचुनावों में डा. संजय लाठर को उतारा। संजय लाठर मथुरा की जनता के लिये नए थे और कद्दावर नेता श्याम सुंदर शर्मा से उनका मुकाबला था। पार्टी के स्थानीय नेताओं में गुटबाजी थी। इसी बीच खुद मुख्यमंत्री ने अपने एक्शन से डा. संजय लाठर का कद बढ़ाया।
पार्टी में गुटबाजी की सूचना पर उन्होंने जिला संगठन भंग कर चुनाव संचालन के लिए सभी गुटों के लोगाें को शामिल कर एक संचालन समिति बनाई और चुनाव को लेकर सख्त हिदायत दी। इसके बाद पूरी सपा उनके चुनाव में जुट गई थी।
एक दर्जन से अधिक मंत्रियों ने जिले में डेरा डाला। बाजना की चुनावी सभा में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उन्हें अपने संघर्ष के दिनों का साथी बताया और इशारों ही इशारों में जनता की बाजना कट की मांग पूरी करने का वादा भी कर दिया। हालांकि सपा सीट तो नहीं जीत पाई लेकिन मांट विधानसभा में पार्टी के वोटों का आंकड़ा 50 हजार तक पहुंच गया था। चुनाव हारने के बाद भी लाठर मांट और मथुरा आते-जाते रहे।
मुलायम ने हटाया तो अखिलेश ने दिया साथ
मथुरा (ब्यूरो)। मुलायम सिंह यादव भी एक बार संजय लाठ नाराज थे और उन्हें युवजन सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटा दिया था। लेकिन तब भी मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने लाठर का साथ दिया था। जब भी मुख्यमंत्री मथुरा आए, हर बार संजय लाठर को अपने साथ लाए।