बरसाना। बरसाना की अलौकिक लठामार होली में आज भी प्रिया-प्रियतम अपने ग्वालों एवं सखियों के साथ होली खेलने आते हैं। राधा-कृष्ण के होली खेलने की गवाही नंदगांव-बरसाना के दोनों मंदिर आज भी देते हैं। जानकारों के मुताबिक जब दोनों जगहों की होली होती है, उस समय मंदिरों के पट बंद रहते हैं। भोग भी नहीं लगता। जब तक उनकी प्रतीकात्मक ध्वजा होली खेल कर वापस मंदिर में नहीं पहुंच जाती।
आज से साढ़े पांच हजार वर्ष पहले नंदगांव से बरसाना होली खेलने के लिए श्रीकृष्ण अपने ग्वालों के साथ कच्चे मार्ग से आते रहे हैं। उसी परंपरा के अनुरूप आज भी उनके प्रतीकात्मक ध्वजा के साथ होली खेलने कच्चे रास्ते से बरसाना आते हैं। ध्वजा को वसंत पंचमी के दिन ही मंदिर में रोपा जाता है। मान्यता है कि इसी ध्वज रूपी डांड़े के साथ नंदगांव के हुरियारे होली खेलने बरसाना आते हैं, लेकिन आज भी कान्हा की होली खेलने की गवाही उनका मंदिर देता है।
दोपहर दो बजे से रात्रि 8 बजे तक मंदिर के पट बद रहते है, क्योंकि भाव यह है कि नंदलाल अपने सखाओं के साथ होली खेलने बरसाना गयौ है। जबतक नंदबाबा मंदिर की ध्वजा बरसाना से लौट नहीं आती तब तक श्रीकृष्ण को बंशी व छड़ी धारण नही कराई जाती। यहां तक कि भोग भी नही लगता। ठीक ऐसे ही जब बरसाना के लोग फगुआ मांगने के रूप होली खेलने नंदगांव जाते हैं तो राधारानी मंदिर के भी पट जब तक बंद रहते हैं, तब तक ध्वजा वापस मंदिर में नहीं आ जाती।
इस ध्वजा के नेतृत्व में ही दोनों गांव के मुखिया होली का शुभारंभ करते है। बरसाना की लठामार होली से पहले कृष्ण का प्रतीक नंदगांव का ध्वजा लाडली जी मंदिर में पहुंचता है और बृषभानु दुलारी को होली खेलने के लिए रंगीली गली बुलाते हैं। ऐसे ही नंदगांव में भी जब बरसाना के हुरियारे होली खेलने जाते हैं तो कान्हा व उनकी भाभियों को होली खेलने बुलाते हैं।